परिवर्तन पर आधारित है। चैतन्य प्रकृति में भ्रांति पद चक्र ऋणात्मक एवं देवपद चक्र धनात्मक संस्कार परिवर्तन होता है। जीवावस्था भ्रांत मानव पद पर्यन्त भ्रांति पद चक्र की सीमा में है। जीवों में धनात्मक संस्कार पूर्वक भ्रांत मानव में होना भ्रांति पद से ऋणात्मक संस्कार पूर्वक जीवावस्था में होना एक वास्तविकता है। यही भ्रांति पद चक्र की सीमा है। इस चक्र से संक्रमित होना ही देव पद चक्र में पदस्थ होना है। देव पद चक्र में भ्रान्ताभ्रांत मानव पद से धनात्मक संस्कार परिवर्तन पूर्ण देव पद में अवस्थित होना, देव पद से ऋणात्मक संस्कार पूर्वक भ्रान्ताभ्रांत मानव पद में होना पाया जाता है। यही देव पद चक्र की सीमा है। साथ ही ऋणात्मक-धनात्मक संस्कार की परिवर्तन की सीमा है। देव पद चक्र से संक्रमित होना ही जीवन मुक्ति है जिसमें ऋणात्मक एवं धनात्मक संस्कार परिवर्तन की कोई संभावना नहीं है। देव पद चक्र में क्रियापूर्णता होती है और जीवन मुक्ति में आचरण की पूर्णता होती है जो वास्तविकता है। भ्रांति पद चक्र में ही सामाजिकता के अभाव वश अनेकानेक समस्याओं का निर्माण मानव, मानव के लिए करता है।
व्यवहारिक मूल्यों का अवमूल्यन = वस्तु मूल्यों का अधिमूल्यन = असामाजिकता = अमानवीयता। व्यक्ति में वस्तु मूल्य का अवमूल्यन = वर्ग मूल्य का अधिमूल्यन = असामाजिकता = अमानवीयता = मानव में वस्तु मूल्य का अवमूल्यन। प्रत्येक व्यक्ति स्व शक्तियों को नियोजित एवं प्रायोजित करने में समर्थ होता है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए निश्चित दायित्व होता है। दायित्व निर्वाह में ही अर्थ का प्रायोजित होना एवं वस्तु मूल्य को निर्मित एवं स्थापित करने में नियोजित होना प्रसिद्ध है। पुन: वस्तु मूल्य दायित्व में अथवा दायित्व के लिए प्रायोजित होता है। प्रायोजित होना ही अर्थ की चरितार्थता है। मानव सहज जीवन प्रयोजन सिद्ध करने के लिए अथवा प्रयोजन सिद्ध होने के लिए प्रयासशील है। मानव का प्रयोजन दायित्व वहन में प्रमाणित होता है। दायित्व एवं कर्त्तव्य की अवहेलना की स्थिति में मानव का जीवन निरर्थक सिद्ध होता है। प्रत्येक मानव सार्थक सिद्ध होना चाहता है। संपूर्ण अर्थ संबंधों में ही प्रायोजित होते हैं न कि और किसी स्थिति में। मानव का अर्थ प्रायोजित होने के लिए मानव परस्परता के अतिरिक्त अन्य कोई स्थली नहीं है। परस्परता मानवीयता पूर्वक प्रायोजित होती है तथा अमानवीयता पूर्वक अप्रायोजित होती है। अप्रायोजित होने का मूल तत्व स्थापित मूल्यों की अनुभूति न होना है। स्थापित मूल्यों का अनुभव हो और उसमें प्रायोजित अर्थ का प्रयोजन सिद्ध न हो, ऐसा कोई प्रमाण नहीं है। मानव पराभव को नहीं चाहता है या मानव के लिए पराभव वांछित घटना नहीं है। पराभव से ग्रस्त न होने के लिए मानव अथक प्रयास करता है। सामाजिक