जैसे पूर्ण मूल्य की ही परावर्तित नामकरण की स्थितियाँ है अर्थात् प्रेममयता की व्यवहार में निर्देश करने हेतु अनेक संज्ञा है। वस्तु स्थिति के प्रसारण हेतु संज्ञा व भाषा का माध्यम अपरिहार्य है। संबंधों की विविधता स्थापित मूल्यों में एकता को प्राप्त करती है। यही एकात्मयता का तात्पर्य है। जिस एक में ही सब का आश्रय हो तथा जो सब के लिए प्रश्रय हो साथ ही जो सब की तृप्ति एवं पूर्णता हो वही अनेक में एकात्मयता है। जैसे प्रकृति का प्रश्रय सत्ता है, प्रकृति सत्ता में ही सम्पृक्त, क्रियाशील एवं पूर्ण होती है। व्यवहार में सत्तामयता ही प्रेममयता की संज्ञा से निर्देशित है। इस प्रकार जड़-चैतन्यात्मक संपूर्ण क्रियाकलाप का प्रश्रय सत्ता ही है। सत्ता में अनुभूति योग्य क्षमता, योग्यता एवं पात्रता से संपन्न होते तक वह जागृति के लिए बाध्य है। यही जागृति क्रम एवं उसके विस्तार का मूल कारण है। सत्तामयता ही प्रेममयता है। इसी तथ्यवश स्थापित मूल्य को अध्यात्म मूल्य की संज्ञा से निर्देशित किया गया है। परस्पर प्रकृति का आधार सापेक्ष रूप में दृष्टव्य है। सत्ता में प्रकृति की सम्पृक्तता, निरपेक्षता के रूप में ज्ञातव्य है। स्थापित मूल्यों के अनुभव, अनुसरण एवं अनुशासन की परंपरा ही मानवता की गरिमा है। मानव में मानव के प्रति निर्विरोधिता पायी जाती है। यह सत्यता अनुभव परंपरा का अनुसरण करने तथा अनुशासित होने की संभावना को स्पष्ट करती है। मानवता के आधारभूत स्थापित मूल्य एवं मूल्यानुभूति के बिना शिष्ट मूल्य एवं वस्तु मूल्य का नियंत्रण होना संभव नहीं है। यही वास्तविकता मानव को मानवीयता में प्रतिष्ठित होने के लिए प्रेरणा है। अखण्डता सहज है। स्थापित मूल्यानुभूति के बिना मानवता प्रमाणित नहीं है। अस्तु, मानव के लिए मानवीयता ही एकमात्र शरण है। यह निर्विवाद तथ्य है। यही लोक मंगल एवं भौमिक स्वर्ग है।
“प्रत्येक मानव भावाभिभूत है।” संबंध विहीन मानव नहीं है। अस्तु, प्रत्येक संबंध भावाभिभूत है। सत्ता से रिक्त मुक्त प्रकृति नहीं है। सत्ता न हो ऐसा कोई स्थान प्रमाणित नहीं है। यह सत्यता सत्तामयता को प्रमाणित करती है। सत्तामयता के अर्थ में ही “व्यापक” संज्ञा निर्देशित है। सत्ता में प्रकृति की सम्पृक्तता भी उसी अर्थ को इंगित करती है। यही सम्पृक्तता, प्रकृति में अनुभूति की बाध्यता है। इसी के योग्य क्षमता सम्पन्न होने में नियति क्रम श्रृंखला का प्रसव है। इसी श्रृंखला में मानव वरीयतम इकाई है। इनमें वैविध्य “तात्रय” की प्रकटन सीमा में दृष्टव्य है। मानवीयता पूर्ण जीवन पर्यन्त इनमें एकात्मकता की सिद्धि नहीं है। मानवीयता पूर्ण जीवन में ही स्थापित मूल्यों की अनुभूति होती है। यही अध्यात्म मूल्य की अनुभूति है। यह पूर्णतया सामाजिक सिद्ध होती है। यही क्षमता अनुभव में चरितार्थ, व्यवहार में प्रायोजित एवं उत्पादन में नियोजित होने में समर्थ होती है। प्रत्येक मानव की क्षमता उसमें होने वाले ऋणात्मक एवं धनात्मक संस्कार