अपहरण पूर्वक ही मानव परस्पर आतंकित एवं सशंकित होता है। फलत: अभाव ग्रस्त होता है अर्थात् भाव में अभाव प्रतीत होता है। उक्त सभी अनावश्यकीय प्रवृत्ति व क्रियाकलाप अभाव के द्योतक हैं, न कि भाव के। अत्याशा विवेचना योग्य क्षमता के अभाव में; आलस्य वस्तु मूल्यानुभूति योग्य क्षमता के अभाव में; प्रमाद व्यवहार मूल्यानुभूति योग्य क्षमता के अभाव में; अज्ञान शिक्षा एवं व्यवस्था में पूर्ण क्षमता के अभाव में; शोषण जागृति के मूल्यांकन योग्य क्षमता के अभाव में; आक्रमण सहअस्तित्व की मौलिकता का अनुभव करने योग्य क्षमता के अभाव में एवं अपहरण व्यक्तित्व एवं प्रतिभा के संतुलन के अभाव में होता है। इसका निराकरण केवल मानवीयता पूर्ण संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था का पाँचों स्थितियों में सम्पन्न होना ही है। अमानवीयता की सीमा में अर्थ के सदुपयोग एवं सुरक्षा की संभावना नहीं है। यही आवेश का मूल कारण है। मानवीयता ही इसका पूर्ण समाधान है।
“भय पूर्वक ही मानव संग्रह में, से, के लिए प्रवृत्त होता है। संग्रह सुविधा में, सुविधाएं विलासिता में, विलासिता अतिभोग में, अतिभोग शोषण एवं हिंसा में, शोषण एवं हिंसा भय में रूपान्तरित होती है। यही क्रम से अतिभोग में प्रवृत्त होने का कारण है। मानव दबाव एवं तनाव में रहना नहीं चाहता है। उसी के भुलावे के लिए मानव विलासिता में प्रवृत्त होता है। यही अन्ततोगत्वा अतिभोग में परिणत होता है। यह स्वयं में पीड़ा होने के कारण परधन, परनारी/परपुरुष एवं परपीड़ा में प्रवृत्त होता है। फलत: आतंक उत्पन्न होता है जो पीड़ा है। पीड़ा मानव को स्वीकार्य नहीं है। स्वयं में स्वयं की पीड़ा स्वयं की वंचना अथवा अक्षमता है। हीनता एवं क्रूरता वंचना-स्ववंचना पूर्वक पीड़ादायक होती है। दीनता अक्षमता का द्योतक होता है। पीड़ा मानव की वांछित उपलब्धि नहीं है। प्रत्येक मानव पीड़ा से मुक्त होना चाहता है। यह सत्यता जागृति की संभावना को स्पष्ट करती है। मानव में प्रतिभा एवं व्यक्तित्व की विषमता ही पीड़ा है जो स्ववंचना की द्योतक है। अस्वीकृति व्यवहार एवं उत्पादन ही प्रतिभा एवं व्यक्तित्व की विषमता है। यही अंतर्विरोध है। अंतर्विरोध ही पीड़ा है। पीड़ा ही द्रोह, विद्रोह और अपराध का कारण है। जिज्ञासा ही जागृति का कारण है। स्वयं पीड़ित हुए बिना अन्य को पीड़ित करना संभव नहीं है। इसके अतिरिक्त यदि पीड़ा होती है तो वह घटनात्मक होती है, जिसमें अज्ञान का होना आवश्यक है। पीड़ा स्वयं में आवेश है ही। आवेश से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय मानवीयता पूर्ण जीवन सहज प्रमाण ही है।