समाधान एवं सफलता है। वस्तु मूल्य अथवा उत्पादन मानव की चरितार्थता के लिए पर्याप्त नहीं है।
“प्रेममयता की अनुभूति जीवन में पूर्णता है।” यही पूर्ण जागृति का द्योतक है। पूर्णता ही जीवन का गन्तव्य है। संज्ञानीयता का यही लक्ष्य है। प्रेमानुभूति में ही अभाव और भाव की विषमताओं का तिरोभाव होता है। तिरोभाव का तात्पर्य भाव के निरन्तरता से है, जो जागृति का सहायक है। विषय चतुष्टय ही भाव के अनन्तर अभाव में एवं अभाव के अनन्तर भाव में परिणत होते हुए देखे जाते हैं।
“प्रेमानुभूति के लिए क्रम केवल मानवीयता पूर्ण जीवन में पूर्णता को पाना ही है।” शुभकामना का उदय मानवीयता में ही प्रत्यक्ष होता है। यही प्रेमानुभूति के लिए सर्वोत्तम साधना है। शुभकामना क्रम से इच्छा में, इच्छा तीव्र इच्छा एवं संकल्प में तथा भासाभास प्रतीति एवं अवधारणा में स्थापित होता है। फलत: प्रेममयता का अनुभव होता है। मानव शुभ आशा से संपन्न है ही। यही अभ्यास पूर्वक क्रम से कामना, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति सुलभ होता है। मानव में प्रमाणित होने वाले नित्य शुभ मूल्य त्रयानुभूति ही है। चैतन्य इकाई का सर्वोच्च विकास मूल्यानुभूति योग्य क्षमता से सम्पन्न होना ही है। यह बाध्यता सत्ता में सम्पृक्तता है। प्रेमानुभूति ही व्यवहार में मंगलमयता को प्रकट करती है। व्यवहार में मंगलमयता का प्रत्यक्ष रूप ही अनन्यता है। ऐसी क्षमता का सर्वसुलभ होना ही लोकमंगल है। सामाजिक अखण्डता ही लोकमंगल का प्रत्यक्ष रूप है। लोक मंगल की संभावना जागृति के क्रम में सर्वसुलभ है। मानव अपने अग्रिम विकास की संभावना को अपने से निर्मित कार्यक्रम से सफल बनाता है। उसकी सफलता केवल प्रेमानुभूति पूर्ण अथवा प्रेमानुभूति योग्य कार्यक्रम में ही है।
“प्रेमानुभूति का आधार केवल स्थापित मूल्यानुभूति ही है।” यह चैतन्य प्रकृति के जागृति क्रम में उत्पन्न होने वाली क्षमता है। ऐसी क्षमता को पाने के लिए मानवीयता में संक्रमण आवश्यक है। मानवीयता, व्यवहार सुलभ एवं अखण्ड समाज है। व्यवहारानुषंगिक स्थापित मूल्यों का अनुभव होना प्रसिद्ध है। व्यवहार अनुभवगामी या अनुभव मूलक होता है। अनुभव मूल्यों से अधिक होता नहीं है। संपूर्ण मूल्य स्पष्ट है। स्थापित मूल्यानुभूति क्षमता में प्रेमानुभूति होना स्वभाविक है। ऐसी क्षमता सर्वसुलभ होना ही लोकमंगल है।