परिवर्तन के लिए अथवा वास्तविकताओं को स्पष्ट करने में समर्थ नहीं है। वास्तविकताएं भय या प्रलोभन नहीं है। वास्तविकताएं केवल गुणात्मक परिवर्तन के लिए बाध्यता एवं उसके अनुसरण में केवल समाधान है। समाधानमयता के लिए बाध्यता एवं उसके अनुसरण में केवल समाधान है। समाधानमयता ही मानव में सुख, शांति एवं संतोष को प्रमाणित करती है।
पुनर्जन्म के पक्ष-विपक्ष में जो कुछ भी रहस्यात्मक चर्चा है उसका निराकरण वास्तविकता पर आधारित है। वास्तविकता सत्ता में सम्पृक्त जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। विकास क्रम में पायी जाने वाली गठनपूर्णता अमरत्व को स्पष्ट करती है। क्रियापूर्णता स्वर्ग, स्वर्गीयता, समाधान एवं समृद्धि को प्रकट करती है। आचरणपूर्णता भ्रम मुक्ति एवं परमानंद को प्रमाणित करती है। ये वास्तविकताएं अभ्युदय में पाये जाने वाले तथ्य हैं।
“अभ्यास केवल वास्तविकताओं के अनुसंधान एवं अनुभव के लिए कार्यक्रम है।” कार्यक्रम सघन व्यवस्था है। सघन व्यवस्था स्वयं प्रक्रिया है। स्वयं प्रक्रिया स्वभावाभिव्यक्ति है। स्वभावाभिव्यक्ति ही नियंत्रण है। नियंत्रण ही सत्तामयता में सम्पृक्तता है। सत्तामयता में नियंत्रण ही अनुभूति है। सत्तामयता में अनुभूति ही चैतन्य प्रकृति की विशालता है। सत्तामयता के अर्थ में व्यापक शब्द प्रायोजित है। प्रकृति की अभ्युदय पूर्णता ही सत्तामयता में अनुभूति है। अभ्युदय पूर्णता ही जागृति पूर्णता है। जागृति पूर्णता ही सतर्कता एवं सजगता है। सतर्कता एवं सजगता ही अभ्यास का चरमोत्कर्ष है। सतर्कता व्यवहार पूर्णता एवं सजगता ही अनुभव पूर्णता का द्योतक है।