सिद्ध होता है जिसमें कायिक एवं वाचिक समत्व प्रत्यक्ष होता है। स्थापित मूल्यानुभूति एवं उसकी निरंतरता ही योगाभ्यास की अर्थवत्ता है। चैतन्य प्रकृति में ही अनुभव योग्य क्षमता योगाभ्यासपूर्वक स्थापित होती है। मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि एवं आत्मा में ही अनुभव योग्य क्षमता जागृत होती है। ये सब चैतन्य इकाई में होने वाली अविभाज्य क्रियाएं हैं। अनुभूति मूल्यों में, से, के लिए होती है। मन एवं वृत्ति के योग से उपयोगिता एवं मूल्यानुभूति, वृत्ति और चित्त के योग से उपयोगिता एवं कला मूल्यानुभूति, चित्त और बुद्धि के योग से शिष्ट मूल्यानुभूति, बुद्धि व आत्मा के योग से स्थापित मूल्यानुभूति होती है। फलत: सत्तामयता में अनुभूति योग्य क्षमता सिद्ध होती है। यही सत्तामयता में सम्पृक्तता की अनुभूति है जो ब्रह्मानुभूति है। यही प्रेमानुभूति है। यह आत्मा में होने वाली विशेषानुभूति है। व्यापकता एवं विशालता में ही अनुभूतियाँ हैं।
साम्य सहज एवं पूर्ण भेद से शिष्टता, विशाल, विशालतर एवं विशालतम भेद से स्थापित मूल्य हैं जो इस प्रकार है :-
विशाल मूल्य | साम्य शिष्टता | ||
1. | ममता | - | उदारता |
2. | वात्सल्य | - | सहजता |
3. | सम्मान | - | सौहार्द्रता |
विशालतर मूल्य | - | सहज शिष्टता | |
4. | कृतज्ञता | - | सौम्यता |
5. | श्रद्धा | - | पूज्यता |
6. | गौरव | - | सरलता |
विशालतम मूल्य | - | पूर्ण शिष्टता | |
7. | स्नेह | - | निष्ठा |
8. | विश्वास | - | सौजन्यता |
9. | प्रेम | - | अनन्यता |