क्रियापूर्णता के द्योतक हैं। इसका प्रत्यक्ष रूप ही सामाजिकता है। अभाव के अभाव में ही चिदानंदानुभूति होती है। चिदानन्द का आधार समाधान ही है। क्रियापूर्णता में समाधान स्वभाव सिद्धि है। विधिवत् अभ्यास की प्रथमोपलब्धि चिदानंद है। चिदानंद ही पूर्ण सामाजिकता को प्रकट करता है अथवा चिदानंद की उपलब्घि पूर्ण सामाजिकता है। चिदानंद के बिना अथवा चिदानंद में अनुगमन के बिना सामाजिकता की अभिव्यक्ति नहीं है अथवा सामाजिकता का सार्वभौम होना संभव नहीं है।
आत्मानंद जीवन में एक महोपलब्धि है। यह प्रत्यावर्तन सिद्धि है। आत्मानंद प्रत्यावर्तन का प्रधान लक्षण है। मानवीयता पूर्ण जीवन से समृद्ध होने के अनन्तर ही प्रत्यावर्तन प्रक्रिया सम्पन्न होता है। आत्मानुशासित जीवन का प्रतिष्ठित होना ही प्रत्यावर्तन का प्रधान लक्षण है। आत्मानुशासित जीवन स्वतंत्रतापूर्वक मानवता को अभिव्यक्त करता है। साथ ही देव मानव पद में प्रतिष्ठित होता है। देव मानव में निवृत्ति परिचय होता है। प्रत्यावर्तन के अनन्तर ही मध्यस्थ जीवन स्थापित होता है। यह स्वतंत्रता का प्रधान कारण है। मानव स्वतंत्रता के लिए अनादिकाल से प्रतीक्षारत है। प्रत्यावर्तन के अनन्तर स्वभावत: मानव स्वतंत्र होता है। यही देव मानव पद है। देव मानव अन्य मानव के लिए मार्गदर्शक होता है। प्रत्यावर्तन के अनन्तर ही आत्मा से बुद्धि, बुद्धि से चित्त, चित्त से वृत्ति एवं वृत्ति से मन अनुशासित होता है। मन से मेधस, मेधस से इंद्रिय व्यापार संपन्न होता है। इस पद्धति से आत्मानुशासित जीवन प्रकट होता है।
“ब्रह्मानंद ही अभ्यास की परमोपलब्धि है अथवा अभ्यास का चरमोत्कर्ष है।” ब्रह्मानंद ही सत्तामयता में अनुभूति है। यही जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति का अभीष्ट है। चैतन्य प्रकृति का अंतिम जागृति सोपान यही है। देव मानवीयता से दिव्य मानवीयता में यही संक्रमण है अथवा आचरणपूर्णता में संक्रमण है। आचरणपूर्णता का प्रधान लक्षण ही ब्रह्मानंद है। ऐसे ब्रह्मानुभूति सम्पन्न व्यक्ति ही आप्त पुरूष हैं । इनमें आप्त कामना स्वभाव रूप में निष्पन्न होता है। यही मध्यस्थ जीवन की सर्वोच्च स्थिति है। ऐसी इकाईयाँ संसार के लिए मार्गदर्शक, पथदर्शक एवं जीवन के रहस्योन्मूलक होती हैं।
“चिदानंद स्थूल एवं सूक्ष्म जीवन की निर्विरोधिता में, आत्मानंद स्थूल-सूक्ष्म-कारण जीवन में एकसूत्रता के रूप में तथा ब्रह्मानंद सत्तामयता में सहअस्तित्व सहज अनुभूति के रूप में प्रमाणित है।” चिदानंद सर्वसुलभ होना ही आत्मानंद एवं ब्रह्मानंद की संभावना है। मानवीयतापूर्ण जीवन में चिदानंद, देव मानवीयतापूर्ण जीवन में आत्मानंद एवं दिव्य मानवीयतापूर्ण जीवन में ब्रह्मानंद