अलंकार जीवन जागृति क्रम में एक अनिवार्य भाग है। अलंकार यश के अर्थ में प्रायोजित होता है। जीवन जागृति के अर्थ में प्रयोजित है। यश जागृति के लिए प्रेरणा स्रोत है। यश प्रेरणा में ही चरितार्थ है। मानव जीवन में भाषा, भाव, संस्कृति एवं सभ्यता का यश होना प्रसिद्ध है। इनकी प्रमाणिकता ही इनका अलंकार है। जीवन सतर्कता एवं सजगता में, भाषा तात्विकताभिव्यक्ति अथवा रसाभिव्यक्ति में, भाव मौलिकता में, संस्कृति मानवीयता में एवं सभ्यता गुणात्मक परिवर्तन में अलंकृत है। अलंकार की चरितार्थता जागृति के ही अर्थ में होती है। जागृति गुणात्मक परिवर्तन ही है। प्रमाणिकता ही अलंकार है। अलंकार यश का होना स्वाभाविक है। उसकी कीर्तिमानता ही परंपरा है। प्रमाण विहीन परंपरा का परिवर्तन होना भावी है। प्रमाण केवल प्रयोग, व्यवहार एवं अनुभूति सहज अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन ही है।
रस जीवन में अविभाज्य तत्व है। रस ही मूल्य है। जीवन का मूल्य मूल्यानुभूति योग्य क्षमता है। मूल्य विहीन जीवन रसानुभूति करने में सक्षम नहीं होता है। इसी सत्यतावश उसे जन सामान्य सहज सुलभ सिद्ध करने के लिए रसानुसंधान एवं उसके लिए कार्यक्रम है। स्थापित मूल्य ही मूलत: रस हैं। रस का तात्पर्य ही जीवन सार से है। उसमें से पूर्ण मूल्य ही पूर्ण रस है। यही रसैश्वर्य है। इसे जीवन में प्रत्येक मानव अनुभव करना चाहता है। रसानुभूति के लिए जीवन में संपूर्ण कार्यक्रम तथा इसी के लिए प्रदर्शन क्रियाकलाप भी सहायक है। इसी में नाट्य अभिनय, नृत्य और प्रहसन भी सहायक हैं। प्रधानत: साहित्य ही इसका माध्यम है। रसानुभूति रति शब्द से इंगित है। मूल्यानुभूति ही अंततोगत्वा तात्विकता एवं रति है। यही साहित्य की मौलिकता, उपादेयता एवं चरितार्थता है। सत्यता ही तात्विकता है। मूल्य और मूल्यानुभूति से अधिक तात्विकता कुछ भी नहीं है। यही रसानुभूति है। साहित्य द्वारा इसी सत्यता के उद्घाटन की अपेक्षा है। सत्यता के उद्घाटन हेतु प्रयुक्त, प्राप्त एवं स्थित साधन ही साहित्य है। ऐसे साधन मानव में शब्दादि पाँच रूपों में हैं। उनमें से शब्द ही वरीयतम साधन है। उसकी तुलना में दूर-दूर तक फैलने व फैलाने योग्य उपयुक्त साधन और कोई नहीं है। शब्द ही भाषा, साहित्य, काव्य, संहिता एवं सूत्र के रूप में प्रयोजित होता है। शब्द भाषा विज्ञान से सुसंस्कृत होकर भाषा के रूप में अवतरित होता है तब वह सार्थक होता है। सार्थकता ही भाषा है। भाषा का तात्पर्य ही है भास-आभास एवं प्रतीति की व्यंजना। साथ ही, उसमें भावग्राही व भाव प्रदायी व्यंजनीयता सिद्ध होती है। मौलिकता ही भाव है। व्यंजनीयता ही संवेदनशीलता है। संवेदनशीलता ही व्यंजनोत्पादीय एवं व्यंजनारत है। अस्तु, भाषा में भाव की, भाषा भाव में शैली एवं भाषा भाव शैली में अलंकार एवं रस की, भाषा भाव शैली अलंकार एवं रस में भाषा विज्ञान तथा भाषा