अस्तित्वशीलता, विकास एवं जागृति अस्तित्वशीलता ही प्रकृति, प्रकृति ही जड़-चैतन्य क्रिया, जड़-चैतन्य क्रिया ही समग्र, समग्र ही अध्ययन, अध्ययन ही जागृति क्षमता एवं जागृति क्षमता ही दर्शन क्षमता है।
“ज्ञानावस्था की चैतन्य इकाई में प्रधान लक्षण दर्शन क्षमता ही है।” मानव की मूल क्षमता या स्वत्व यही है। यही क्षमता “तात्रय” को स्पष्ट करती है। यही स्व-पर मौलिकता की स्वीकृति ही संस्कार, संस्कार ही निश्चय, निश्चय ही संकल्प, संकल्प ही अनुगमन एवं अनुसरण, अनुगमन एवं अनुसरण ही अनुसंधान एवं संधान, अनुसंधान एवं संधान ही व्यवहार एवं उत्पादन, व्यवहार एवं समृद्धि ही अनुभूति व समाधान, अनुभूति व समाधान ही जीवन, जीवन ही अस्तित्व एवं परमानंद, अस्तित्व एवं परमानंद ही सतर्कता एवं सजगता, सतर्कता एवं सजगता ही पूर्ण जागृति, पूर्ण जागृति ही दर्शन क्षमता की परमावधि है।
“मानव इस सृष्टि में सर्वोच्च विकसित इकाई है। यह कम विकसित का भी दर्शक, समान में सहअस्तित्वशील, अधिक विकास के लिए अभ्यासशील, पूर्णता के लिए जिज्ञासु है।”
प्रकृति का अध्ययन एवं दर्शन तथा मूल्यों का अनुभव प्रसिद्ध है। अनुभव क्षमता ही मूल्य एवं मूल्यांकन का निष्कर्ष है। स्थिति मूल्य या मूल्यांकन ही अनुभव है। अनुभव विहीन मानव अपने में स्पष्ट नहीं होता है। प्रत्येक मानव स्पष्ट होने में, से, के लिए निरंतर प्रयासशील है। स्वयं स्पष्ट होना ही समाधान एवं अनुभव पूर्ण प्रकटन है। तत्पर्यन्त मानव संतृप्त नहीं है। सम्यक प्रकार से तृप्ति ही संतृप्ति है। सम्यक प्रकार से तुष्टि ही संतुष्टि है। संतुष्टि का तात्पर्य पूर्णता से है। आद्यान्त प्रकृति में पूर्णता की स्थिति तीन ही है वह गठन, क्रिया और आचरण ही है जो प्रमाण सिद्ध है। पूर्णता त्रय सम्पन्नता ही जीवन में पूर्णता है जो प्रमाण सिद्ध है जो सजगता, सतर्कता एवं अमरत्व है। यही समाधान व प्रतिभा का चरमोत्कर्ष है। यही सहअस्तित्व, समृद्धि, स्वर्ग, मंगल, शुभ है। यही अभ्युदय है जिसके लिए मानव अनादि काल से तृषित है। इसे सर्वसुलभ बनाना ही मानवीय शिक्षा एवं व्यवस्था का आद्यान्त कार्यक्रम एवं सफलता है।
“सजगता एवं सतर्कता का प्रकटन अर्थ के सदुपयोग एवं सुरक्षा के ही रूप में भी दृष्टव्य है।” तन-मन-धन की सुरक्षा एवं सदुपयोग प्रसिद्ध है। इन तीनों क्रम में धन से तन, तन से मन वरीय है। मन आश्रित तन, मन एवं तन आश्रित धन प्रसिद्ध है। मानसिकता के अनुरूप ही शरीर संचालन और कार्य व्यवहार प्रवृत्ति अर्थ का उपार्जन एवं उपयोग प्रसिद्ध है। मन का तात्पर्य ही विचार से है। संपूर्ण विचार निपुणता, कुशलता और पाण्डित्य ही है। विचार के अभाव में मानव