व्यवस्था पूर्वक देवपद चक्र में संक्रमित एवं प्रतिष्ठित हो जाना ही समस्या से मुक्ति और समाधान परिपूर्णता है। यही इस पृथ्वी पर होने वाली स्थायी उपलब्धि है। प्रकृति के अंतर्गत इस पृथ्वी के विकास क्रम में वर्तमान बिन्दु जो वास्तविकता को स्पष्ट कर रही है वह केवल मानव को देवपद चक्र में संक्रमित होने के लिए संकेत है क्योंकि मानव सामान्य एवं महत्वाकाँक्षाओं से संबंधित समस्त साधनों से सम्पन्न हो चुका है। जड़ प्रकृति के उपयोग क्रम में उसकी गति निरंतरता मानव को प्राप्त हो चुकी है। इन उपलब्धियों की सदुपयोगिता मानवीयता पूर्ण सामाजिकता एवं व्यवहार में सिद्ध होती है। जिसकी पूर्ण संभावना अविरत बनी हुई है।
“जो जिसका अपव्यय करेगा वह उससे वंचित हो जायेगा।” यह सिद्धान्त स्वयं इस स्थिति को स्पष्ट कर रहा है कि सद्व्ययता की सीमा में ही प्राप्त उपलब्धियों की अक्षुण्णता रहेगी अन्यथा में, से, के लिए उससे वंचित होने अवश्यम्भावी है। यह सत्यता मानव को उत्प्रेरित करती है कि उपलब्धि एवं उपलब्धि के स्रोत अस्त होने के पहले उसे अनुस्यूत बनाये रखने के लिए तत्पर हो जाए। यह तत्परता केवल देव पद चक्र में ही सफल होती है। इसी में समाधान समृद्धि पूर्वक सत्यता की अनुभूति प्रमाणित होती है। अनुभूति मूलक जीवन ही मानव का चिरवांछित जीवन है। भ्रांति पर्यंत अनुभव संभव नहीं है। अनुभव ही जीवन का वरीयतम आयाम है जिस में, से, के लिए अन्य तीनों आयाम अर्थात् विचार, व्यवहार एवं उत्पादन अनुभव से ही संचालित होना अभ्युदय है। अस्तु, मानव जीवन के कार्यक्रम को मानवीयता पूर्वक दश सोपानीय व्यवस्था में आत्मसात् कर लेना ही सर्वमंगल, शुभ, समाधान, समृद्धि, सहअस्तित्व एवं अभय है।