में चरितार्थ है। ऐतिहासिक अर्थवत्ता नियति क्रमानुषंगिक निष्पन्न होती है। प्रकृति का विकास क्रम ही नियति क्रम है। प्रत्येक मानव की रूचियाँ आचरण में अभिव्यक्त होती है। रूचियाँ संवेगानुरूपीय, संवेग मूल प्रवृत्ति के रूप में, मूल प्रवृत्तियाँ संस्कार मूलक प्रक्रिया के रूप में दृष्टव्य है। संस्कारानुबंध आचरण विशेषत: स्वयं की तृप्ति के लिए प्रायोजित होता है जबकि व्यवहार प्रधानत: परतृप्ति के संदर्भ में भी सम्पन्न होता है। स्वयं में तृप्ति मानवीयता पूर्ण पद्धति से “नियम त्रय” के पालन में सर्वसुलभ होती है। अमानवीयता में वह सुलभ नहीं है। अमानवीय मूल प्रवृत्तियाँ भय से मुक्त नहीं है। भय स्वयं में तृप्ति का साधन नहीं है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि मानवीयता पूर्ण पद्धति से किया गया विचार ही विश्राम के लिए एकमात्र शरण है। मानवीयता सहज आचरण पूर्वक भय का अभाव होता है। समाधान एवं समृद्धि का भाव होना पाया जाता है।
आहार शरीर पोषण के लिए चरितार्थ होता है। शरीर विहार, व्यवहार एवं उत्पादन के अर्थ में सार्थक साधन है। अमानवीयता में आहार ही महत्वपूर्ण आकाँक्षा के रूप में ज्ञातव्य है। मानवीयता में व्यवहार एवं अतिमानवीयता में आचरण ही सर्वोच्च महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। आहार, विहार एवं व्यवहार की एकात्मकता ही जीवन में तृप्ति है। इनमें अन्तर्विरोध ही अतृप्ति है। अतृप्ति शिक्षा का विषय नहीं है। तृप्ति ही शिक्षा के लिए विषय वस्तु है। प्रत्येक मानव किसी न किसी अंश में शिक्षक एवं शिक्षार्थी है जो प्रत्यक्ष है। इस पद्धति से यह निष्कर्ष मिलता है कि मानवीयता पूर्ण आचरण एवं व्यवहार निर्वाह करने योग्य अथवा सहायक रूप में ही आहार का सेवन सर्वोचित होगा।