जाती है परस्पर आयामों में निर्विषमता ही एकसूत्रता का प्रत्यक्ष रूप है। यही स्वभाव गति का तात्पर्य है। ऐसी स्वभाव गति अथवा स्वभाव सिद्धि को पाने के लिए मानव अनवरत तृषित है। मानवीयता पूर्ण जीवन का कार्यक्रम ही जीवन में स्थिरता, न्याय प्रदायी क्षमता और अधिक उत्पादन कम उपभोग योग्य योग्यता का उपार्जन है। अमानवीयता पूर्ण जीवन में न्याय प्रदायी क्षमता का निर्माण होना संभव नहीं है। न्याय प्रदायी क्षमता के बिना समाज संरचना एवं सामाजिकता का निर्वाह सिद्ध नहीं होता। सामाजिकता के बिना मानव सफल नहीं है। इस सत्यता से यह स्पष्ट होता है कि मानव अपने में चारों आयामों की एकसूत्रता पूर्ण जीवन यापन करने के लिए बाध्य, इच्छुक एवं तृषित है। यह केवल मानवीयता पूर्ण शिक्षा अर्थात् व्यवहार एवं व्यवसाय की संतुलित शिक्षा और व्यवस्था पद्धति से ही सफल होता है। यही नित्य मंगल एवं शुभोदय है।
अखण्ड समाज परंपरा में ही प्रतिभा एवं व्यक्तित्व का संतुलन, उदय एवं उसकी अक्षुण्णता रहती है। यही भौतिक समृद्धि एवं बौद्धिक समाधान है। यही मध्यस्थ जीवन का प्रत्यक्ष रूप है। मध्यस्थ जीवन का तात्पर्य न्याय प्रदायी क्षमता, सही करने की परिपूर्ण योग्यता सत्य बोध सम्पन्न रहने से है। न्याय ही व्यवहार में तथा नियम ही व्यवसाय में मध्यस्थता को सिद्ध करता है। मूल्य त्रयानुभूति योग्य क्षमता, योग्यता, पात्रता इसका प्रमाण है। यही शिक्षा एवं दश सोपानीय व्यवस्था सहज महिमा है। शिक्षा एवं व्यवस्था ही मूल्यानुभूति एवं मूल्यवहन योग्य क्षमता को प्रदान करती है। यही वर्ग विहीनता का एकमात्र आधार एवं उपलब्धि है। वर्गवादी शिक्षा एवं व्यवस्था सामाजिकता को प्रदान करने में समर्थ नहीं है। फलत: निर्विषमता, निर्भ्रमता, अभयता एवं समृद्धि की उपलब्धि नहीं है। मानव के प्रति मानव का अध्ययन जब तक पूर्ण नहीं होगा तब तक भ्रम है। भ्रम ही अपूर्णता है। अपूर्णता ही प्रकारान्तर से वर्ग भावना को जन्माती है। अपूर्णता के बिना वर्ग भावना का प्रसव नहीं है। निर्विषमता पूर्वक ही मानव में अखण्डता, सामाजिकता, समाधान एवं समृद्धि का अनुभव होता है। निर्भ्रमता ही निर्विषमता है। यही सार्वभौमिकता है। मूल्य त्रयानुभूति ही निर्भ्रमता का प्रमाण है। मूल्य मात्र सर्वदेशीय एवं सर्वकालीय होने के कारण सार्वभौमिक है। सार्वभौमिकता ही निर्विषमता है। सामाजिक मूल्यों का शिष्ट मूल्यों सहित निर्वाह ही न्यायपूर्ण जीवन है। स्थापित मूल्य एवं शिष्ट मूल्य का योगफल ही सामाजिकता है। वस्तु मूल्य ही समृद्धि है।