नैतिकतापूर्ण जीवन की अपेक्षा मानव की परस्परता में दृष्टव्य है। यही प्रत्येक स्तर एवं स्थिति में भी पाया जाने वाला तथ्य है। धर्मनीति एवं राज्यनीति ही सम्पूर्ण नीति है। अर्थ ही उनका आधार है। इन नीति द्वय का विधिवत् पालन ही नैतिकता है। प्रत्येक मानव नैतिकता से सम्पन्न होना चाहता है। प्रत्येक संस्था प्रत्येक मानव को नैतिकता से परिपूर्ण बनाना चाहता है। धर्म नैतिक एवं राज्य नैतिक संस्थाओं द्वारा मानव को नैतिकता से परिपूर्ण करने का संकल्प किया जाना प्रसिद्ध है। भौतिकवादी ही व्यवस्था पद्धति में संदिग्धता है। शिक्षा में अपूर्णता का तात्पर्य पर्याप्त वस्तु-विषय, समुचित नीति, पद्धति तथा उसकी सर्वसुलभता न होने से है। शिक्षा प्रणाली पद्धति का पूर्ण होना अनिवार्य है। जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति के पूर्ण विश्लेषण संपन्न वस्तु-विषय का समावेश हुए बिना शिक्षा प्रणाली में पूर्णता संभव नहीं है। प्रधानत: सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व और चैतन्य प्रकृति के अध्ययन की अपूर्णता ही मानव को सभ्रम बनाने का कारण है। भ्रमता सामाजिकता नहीं है। मानव का अति महत्वपूर्ण रूप चैतन्य क्रिया ही है। चैतन्यता का तात्पर्य आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति सहज प्रमाण से है। यह परमाणु में गठनपूर्णता के अनन्तर गुणात्मक परिवर्तन पूर्वक प्रकट होने वाली क्रिया एवं तथ्य है। रासायनिक क्रिया की सीमा में आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति का प्रकट न होना पाया जाता है। चैतन्य परमाणु में ही इन तथ्यों का उद्घाटन होना प्रमाणित है। प्रकृति में ही विकास क्रम, ज्ञानावस्था में निर्भ्रम जागृत मानव द्वारा दृष्टव्य है। अधिक विकसित, कम विकसित का दृष्टा है। विकासशीलता प्रकृति का कार्य सीमा है। विकासशीलता के लिए प्रकृति के अतिरिक्त और कोई वस्तु या तत्व नहीं है। सत्तामयता में तरंग या गति सिद्ध नहीं होता है। सत्ता में प्रकृति के अतिरिक्त और कोई अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। इन प्रमाणों से प्रकृति की विकासशीलता के प्रति भ्रम निवारण होना पाया जाता है। सत्ता स्वयं में पूर्ण रहना प्रमाण सिद्ध है। इसी सत्यता से स्पष्ट होता है कि “पूर्ण” (सत्ता) परिणामशील नहीं है और नित्य वर्तमान है।
जबकि स्थितिपूर्ण सत्ता में इस प्रकार का हस्तक्षेप संभव नहीं है। सत्ता तंरग गति एवं सीमा नहीं है। यही पूर्णमय महिमा है। सत्ता रचना विहीन साम्य ऊर्जा रूप में स्थिति है जो प्रभाव विशेष है। यही नियम, न्याय, धर्म, सत्य एवं आनन्द स्थिति में जागृत मानव परंपरा में प्रमाण है। अपूर्ण का ही पूर्णता के लिए परिणाम रत, परिमार्जन रत होना स्वभाव सिद्ध तथ्य है क्योंकि परिणाम स्वयं की, मैं की अपूर्णता को स्पष्ट करता है। पूर्ण में समाविष्ट रहने के कारण प्रकृति में पूर्णता के लिए तृषा है। यही तृषा क्रम से विकास क्रम में अनेक यथास्थितियाँ सम्पूर्णता के साथ और “पूर्णता त्रय” पर्यन्त विकास व जागृति को स्पष्ट करता है। इसी जागृति क्रम में मानव जड़-चैतन्यात्मक