प्रकृति का अध्ययन करने योग्य अवसर को प्राप्त किया है। इस अवसर का प्रयोग, व्यवहार एवं अनुभवपूर्वक प्रमाणित हो जाना ही सफलता है। चैतन्य क्रिया जागृति सहज प्रमाण प्रस्तुत करता है न कि जड़ क्रिया। अनुभवपूर्ण जीवन ही सफल जीवन है। मानव में अनुभव का अभाव नहीं है। स्थापित मूल्यानुभूति पर्यन्त मानव भ्रम से मुक्त नहीं है। मूल्य त्रयानुभूति की सर्वसुलभता ही शिक्षा एवं व्यवस्था का आद्यान्त कार्यक्रम है। मौलिक शिक्षा अर्थात् मानवीय शिक्षा अर्थात् चेतना विकास मूल्य शिक्षा सहज सर्वसुलभता पर्यन्त सामाजिकता एक कल्पना ही है। उसकी सहकारिता शिक्षा की पूर्णता एवं उसकी सर्वसुलभता पर निर्भर करता है। यही वह समय है जिसमें मानव मौलिक शिक्षा की सर्वसुलभता के लिए बाध्य हो गया है। राज्यनैतिक एवं धर्मनैतिक संस्थाएं सामाजिकता को प्रस्थापित करने के लिए दृढ़ संकल्पि हो रहे हैं। सामाजिकता में परस्पर सबका संबंध संपर्क सबसे ही है। यही लक्षण सामाजिकता एवं अखण्ड समाजोदय की संभावना को स्पष्ट करता है।
मानव जीवन का विधिवत् कार्यक्रम धार्मिक, आर्थिक एवं राज्यनैतिक रूप में स्पष्ट है। मानव का ऐसा कोई विधिवत् कार्यक्रम नहीं है जो इन तीनों से संबद्ध न हो। नीति, पद्धति एवं प्रणाली का संयुक्त रूप ही व्यवस्था है। विश्वसन एवं आश्वसन को स्थायीभूत करने के लिए की गई प्रक्रिया ही व्यवस्था का प्रत्यक्ष रूप है। व्यवस्था विहीन जीवन वांछित को पाने में असमर्थ रहेगा। व्यवस्था विहीनता अथवा व्यवस्था में अपूर्णता जीवन की पूर्णता के अर्थ में प्रयोजित नहीं होती है। यही प्रत्येक जीवन में अपूर्णता है। जीवन में अपूर्णता ही जीवन के कार्यक्रम में अपूर्णता है। जीवन के कार्यक्रम में अपूर्णता ही भ्रम एवं समस्या है। भ्रम एवं समस्या ही व्यवस्था में अपूर्णता है। व्यवस्था को मानव ही अनुभव एवं व्यवहारपूर्वक प्रमाणित करता है। फलत: उसे सर्वसुलभ बनाने के लिए प्रस्थापना, स्थापना एवं संचालन करता है जो चरितार्थता का स्पष्ट रूप है। प्रत्येक मानव नियति क्रम व्यवस्था का अनुभव करने के लिए अवसर रहते हुए योग्यता, पात्रता न होने के कारण शिक्षा एवं व्यवस्था में समर्पित होता है या ऐसे अधिकार सम्पन्न अधिकारी होने के लिए समर्पित होते है। हर मानव संतान शिक्षा-संस्कार पूर्वक ही प्रबुद्ध होने की व्यवस्था है। यह नियति है। क्योंकि मानव ज्ञानावस्था की इकाई है। ज्ञान परंपरा से ही सर्वसुलभ होता है। किसी मानव को ज्ञान की तृषा हो वह तृषा परंपरा में सुलभ न हो, ऐसे स्थिति में कोई मानव संतान ही उसकी भरपाई करता हुआ घटना विधि से स्पष्ट हुआ है। इसी क्रम में अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन बनाम मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद) मानवीय शिक्षा-दीक्षा व्यवस्था परंपरा में समावेश होने अर्पित है। शिक्षा एवं व्यवस्था केवल प्रबुद्धता