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-16 मानव अभ्यास दर्शन -15 विकल्प -10 मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व -4 मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु -2 कृतज्ञता -1 प्राक्कथन 1 1. अभ्यास दर्शन 2 2. अभ्यास की अनिवार्यता 14 3. अभ्युदय की अनिवार्यता 18 4. अखण्ड समाज गति सहज सामाजिकता की अनिवार्यता 22 5. सामाजिकता का अध्ययन 24 6. सामाजिकता का आचरण 30 7. स्थापित मूल्यों की अनिवार्यता सर्वदा सबके लिए समान है। 32 8. जनाकाँक्षा को सफल बनाने योग्य शिक्षा व व्यवस्था 37 9. समाज व्यवस्था 54 10. मानव संस्कृति 57 11. व्यक्तित्व एवं प्रतिभा का संरक्षण ही अर्थ का संरक्षण है। 64 12. न्याय पाना, सही कार्य व्यवहार करना एवं सत्य सम्पन्नता ही साम्यत: जनाकाँक्षा है। 66 13. सतर्कता सजगता पूर्ण परंपरा में मानवीयता सहज चरितार्थता स्वभाव सिद्ध है। 69 14. भ्रमित मानव समुदाय की प्रथम अवस्था भय प्रलोभन है। 72 15. लाभ उत्पादन नहीं है। 75 16. विनिमय क्रिया जागृत मानव परंपरा में अनिवार्य प्रक्रिया है। 76 17. ईश्वर तंत्र पर आधारित राज्य नीति एवं धर्म नीति रहस्यता से मुक्त नहीं है। 78 18. प्रत्येक मानव इकाई भ्रम, भय, रहस्य मुक्ति के लिए प्रयासरत है। 81 19. आचरणपूर्णता पर्यन्त शिक्षा में गुणात्मक परिवर्तन का अभाव नहीं है। 87 20. केवल साधनों की प्रचुरता मानवीयता को स्थापित करने में समर्थ नहीं है। 91 21. विकास व जागृति ही वैभव क्रम है। 93 22. प्रत्येक मानव समाजिकता के लिए समर्पित होना चाहते है। 95 23. कम्पनात्मक एवं वर्तुलात्मक गति का वियोग नहीं हैं। 96 24. सर्वशुभ उदय का भास-आभास संवेदनशीलता की ही क्षमता है और प्रतीति व अनुभूति संज्ञानीयता की महिमा है। 98 25. आवेश मानव का अभीष्ट नहीं है। 100 26. मानव में संचेतनशीलता ही संस्कार एवं जागृति सम्पन्नता सहज आधार एवं प्रमाण है। 104 27. सामाजिकता का आधार संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था ही है। 108 28. जिज्ञासात्मकता सुखी होने के अर्थ में एवं आवेशात्मक क्रियाकलाप के फलस्वरूप पीड़ाएं प्रसिद्ध हैं। 110 29. मानव में न्यायापेक्षा, सही करने की इच्छा और सत्य वक्ता होना जन्म से ही दृष्टव्य हैं। 112 30. मानव में अखण्डता के लिए मानवीयता ही एकमात्र शरण है। 117 31. मानवीयतापूर्ण जीवन में, से, के लिए सुसंस्कारों का अभाव नहीं है। 128 32. संस्कार ही संस्कृति को प्रकट करता है। 130 33. केवल उत्पादन ही मानव के लिए जीवन सर्वस्व नहीं है। 136 34. मानव के संपूर्ण संबंध गुणात्मक परिवर्तन के लिए सहायक हैं। 138 35. कुशलता, निपुणता एवं पाण्डित्य ही ज्ञानावस्था की मूल पूंजी है। 143 36. समाधान, समृद्धि, अभय एवं सहअस्तित्व में अनुभव मानव धर्म की चरितार्थता है। 145 37. व्यक्ति का व्यक्तित्व न्याय प्रदायी क्षमता से प्रदर्शित है। 149 38. संपूर्ण अध्ययन अनुभूति, समाधान, सहअस्तित्व एवं समृद्धि के लिए ही है। 154 39. मानव का संपूर्ण कार्यक्रम धार्मिक, आर्थिक एवं राज्यनीति में, से, के लिए है। 157 40. पाण्डित्य ही मनुष्य में विशिष्टता हैं। 160 41. समाज संरचना का आधार “मूल्य त्रय” ही है। 165 42. भोगों में संयमता से अभयता पूर्ण जीवन प्रत्यक्ष होता है। 171 43, समस्त प्रकार के वर्ग की एकमात्र समाधान स्थली मानवीयता ही है। 175 44. अभयता का प्रत्यक्ष रूप ही वर्तमान में विश्वास है। 178 45. आवेश (लाभोन्माद, भोगोन्माद, कामोन्माद) मानव की स्वभाव गति नहीं है। 181 46. प्रत्येक स्थिति में किए गए अभ्यास का प्रत्यक्ष रूप ही व्यवहार एवं व्यवस्था है। 183 47. व्यक्तित्व और प्रतिभा की चरमोत्कर्षता में ही प्रेमानुभूति होती है। 187 48. उत्पादन एवं व्यवहारिकता अखण्ड समाज में, से, के लिए अपरिहार्य है। 190 49. प्रमाण त्रय ही विश्वास है। 192 50. मानव में स्थूल, सूक्ष्म व कारण भेद से क्रियाशीलता प्रसिद्ध है। 195 51. अभ्यास समग्र की उपलब्धि क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता ही है। 198 52. अमानवीयता से ग्रसित वर्ग संघर्ष की सीमा में प्रलोभन व भय का अभाव नहीं है। 200 53. मानव जीवन में भक्ति जागृति के अर्थ में वांछित प्रक्रिया है। 202 54. योगाभ्यास जागृति के अर्थ में चरितार्थ होता है।

प्रकृति का अध्ययन करने योग्य अवसर को प्राप्त किया है। इस अवसर का प्रयोग, व्यवहार एवं अनुभवपूर्वक प्रमाणित हो जाना ही सफलता है। चैतन्य क्रिया जागृति सहज प्रमाण प्रस्तुत करता है न कि जड़ क्रिया। अनुभवपूर्ण जीवन ही सफल जीवन है। मानव में अनुभव का अभाव नहीं है। स्थापित मूल्यानुभूति पर्यन्त मानव भ्रम से मुक्त नहीं है। मूल्य त्रयानुभूति की सर्वसुलभता ही शिक्षा एवं व्यवस्था का आद्यान्त कार्यक्रम है। मौलिक शिक्षा अर्थात् मानवीय शिक्षा अर्थात् चेतना विकास मूल्य शिक्षा सहज सर्वसुलभता पर्यन्त सामाजिकता एक कल्पना ही है। उसकी सहकारिता शिक्षा की पूर्णता एवं उसकी सर्वसुलभता पर निर्भर करता है। यही वह समय है जिसमें मानव मौलिक शिक्षा की सर्वसुलभता के लिए बाध्य हो गया है। राज्यनैतिक एवं धर्मनैतिक संस्थाएं सामाजिकता को प्रस्थापित करने के लिए दृढ़ संकल्पि हो रहे हैं। सामाजिकता में परस्पर सबका संबंध संपर्क सबसे ही है। यही लक्षण सामाजिकता एवं अखण्ड समाजोदय की संभावना को स्पष्ट करता है।

मानव जीवन का विधिवत् कार्यक्रम धार्मिक, आर्थिक एवं राज्यनैतिक रूप में स्पष्ट है। मानव का ऐसा कोई विधिवत् कार्यक्रम नहीं है जो इन तीनों से संबद्ध न हो। नीति, पद्धति एवं प्रणाली का संयुक्त रूप ही व्यवस्था है। विश्वसन एवं आश्वसन को स्थायीभूत करने के लिए की गई प्रक्रिया ही व्यवस्था का प्रत्यक्ष रूप है। व्यवस्था विहीन जीवन वांछित को पाने में असमर्थ रहेगा। व्यवस्था विहीनता अथवा व्यवस्था में अपूर्णता जीवन की पूर्णता के अर्थ में प्रयोजित नहीं होती है। यही प्रत्येक जीवन में अपूर्णता है। जीवन में अपूर्णता ही जीवन के कार्यक्रम में अपूर्णता है। जीवन के कार्यक्रम में अपूर्णता ही भ्रम एवं समस्या है। भ्रम एवं समस्या ही व्यवस्था में अपूर्णता है। व्यवस्था को मानव ही अनुभव एवं व्यवहारपूर्वक प्रमाणित करता है। फलत: उसे सर्वसुलभ बनाने के लिए प्रस्थापना, स्थापना एवं संचालन करता है जो चरितार्थता का स्पष्ट रूप है। प्रत्येक मानव नियति क्रम व्यवस्था का अनुभव करने के लिए अवसर रहते हुए योग्यता, पात्रता न होने के कारण शिक्षा एवं व्यवस्था में समर्पित होता है या ऐसे अधिकार सम्पन्न अधिकारी होने के लिए समर्पित होते है। हर मानव संतान शिक्षा-संस्कार पूर्वक ही प्रबुद्ध होने की व्यवस्था है। यह नियति है। क्योंकि मानव ज्ञानावस्था की इकाई है। ज्ञान परंपरा से ही सर्वसुलभ होता है। किसी मानव को ज्ञान की तृषा हो वह तृषा परंपरा में सुलभ न हो, ऐसे स्थिति में कोई मानव संतान ही उसकी भरपाई करता हुआ घटना विधि से स्पष्ट हुआ है। इसी क्रम में अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन बनाम मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद) मानवीय शिक्षा-दीक्षा व्यवस्था परंपरा में समावेश होने अर्पित है। शिक्षा एवं व्यवस्था केवल प्रबुद्धता

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