की प्रबोधन एवं संरक्षण प्रक्रिया है। यह विभूति मूलत: किसी मानव की ही अनुभूति है। अनुभूति ही वरीय प्रमाण है। ऐसी शिक्षा एवं व्यवस्था संहिता मानव के समग्र जीवन के प्रति अनुभव पूत होते तक उनमें परिवर्तन, परिमार्जन के लिए समुचित प्रक्रिया है। साथ ही वह दायी एवं उत्तरदायी भी है। ऐसी पूर्णता का प्रमाण अखण्ड समाज है जिसके लिए धार्मिक, आर्थिक एवं राज्यनैतिक एकरूपता पूर्वक दश सोपानीय व्यवस्था में एकात्मकता को प्रदान करने योग्य सक्षम दर्शन संहिता ही आधार है। यही प्रत्येक मानव में मन-तन-धनात्मक अर्थ की सर्ववांछित सुरक्षा एवं सदुपयोगात्मक क्षमता को प्रादुर्भावित करता है। साथ ही सर्वसुलभता भी करता है। फलत: अखण्ड समाज की सिद्धि होती है।
मानव में ज्ञान शक्ति की अर्थात् आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभव प्रमाण शक्ति ही धीरता, वीरता एवं उदारता तथा दया, कृपा एवं करुणा है। विषम जीवन जीव चेतनावश पराभवित, सम जीवन (जागृत मानव) समाधानित एवं मध्यस्थ जीवन सफलता से परिपूर्ण सिद्ध होता है। मानव मध्यस्थ जीवन के लिए ही प्रमाण होना जागृति है। असफलता मानव की वांछित घटना या उपलब्धि नहीं है। सफलता ही मानव की चिर तृषा, वाँछा, आकाँक्षा, इच्छा एवं संकल्प है। सफलता के बिना मानव जीवन अपूर्णता को स्पष्ट करता है। अपूर्णता ही पूर्णता के लिए बाध्यता है। अंतरंग अर्थात् आशा, विचार, इच्छा एवं संकल्प तथा चतुरायाम की परस्परता में और बहिरंग अर्थात् पाँचों स्थितियों की परस्परता में विषमता ही अंतर्बहिर्विरोध है। यही असामाजिकता, अमानवीयता, वर्ग एवं संकीर्ण सीमान्तवर्ती संगठन का, समता ही सामाजिकता अर्थात् वर्ग विहीनता का एवं मध्यस्थ में स्वतंत्रता का अनुभव प्रमाण सिद्ध है। दिव्य मानव में ही धार्मिक, आर्थिक एवं राज्य नीतियाँ स्वतंत्रता पूर्वक चरितार्थ होती हैं। वे देव मानव में संयमता पूर्वक सफल होती हैं। मानवीयतापूर्ण मानव में समाधान पूर्वक सफल एवं चरितार्थ होती है। यह मानवीयतापूर्ण शिक्षा एवं व्यवस्था पद्धति से सर्वसुलभ एवं चरितार्थ होती है अन्यथा असफल होती है।
अन्तर्विरोध विहीनता ही मध्यस्थता है। यही संतुलन, समाधान, प्रत्यावर्तन, सतर्कता, सजगता एवं स्वतंत्रता है। अंतर्विरोध परस्पर मन-वृत्ति-चित्त-बुद्धि, चतुरायाम में तथा दश सोपानीय परिवार सभा व्यवस्था में विश्लेषित है। यही गुणात्मक परिवर्तन के लिए बाध्यता है। मानव के अंतर्विरोध से मुक्त होने का आद्यान्त लक्षण उपाय एवं उपलब्धि ही है। साथ ही मानव अंतर्विरोध में, से, के लिए प्रयासी नहीं है। संपूर्ण प्रयास विरोध मुक्ति के अर्थ में ही है। अंतर्विरोध की