समर्थ शिक्षा ही गन्तव्य के लिए गति एवं विश्राम के लिए दिशा को अध्ययन पूर्वक स्पष्ट करती है। यही शिक्षा की गरिमा है। उसी से मानव में प्रगति एवं जागृति है। यही अभ्युदय का प्रधान लक्षण है। शिक्षा एवं व्यवस्था का संकल्प ही अभ्युदय है। अभ्युदय विहीन जीवन ही समस्या से ग्रस्त होना पाया जाता है। जीवन के कार्यक्रम का आधार ही अध्ययन है। अध्ययन श्रवण, मनन, निदिध्यासन की संयुक्त प्रक्रिया है। निश्चित अवधारणा की स्थापन प्रक्रिया ही निदिध्यासन है। अवधारणा ही अनुमान की पराकाष्ठा एवं अनुभव के लिए उन्मुखता है। अवधारणा के अनन्तर ही अनुभव होता है। अनुभव एवं समाधान दोनों के ही न होने की स्थिति में अध्ययन नहीं है। वह केवल निराधार कल्पना है। जो अध्ययन नहीं है वह सब मानवीयता को प्रकट करने में समर्थ नहीं है। इसी सत्यतावश मानव समाधान एवं अनुभूति योग्य अध्ययन से परिपूर्ण होने के लिए बाध्य हुआ है। यह बाध्यता मानवीयता पूर्ण पद्धति से सफल अन्यथा असफल है।
“अनुभव एवं समाधान ही संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था में चरितार्थ होता है।” यही जीवन में सफलता एवं स्वर्ग है। ऐसी स्थिति को पाने के लिए, पाने के उद्देश्य से अथवा पाने की आकाँक्षा से ही अनादिकाल से मानव प्रयासरत है। रत का गन्तव्य रति है। रति केवल अनुभवात्मक एवं सान्निध्यात्मक प्रमाणित होती है। अनुभूति केवल सत्ता में “मूल्य त्रय” की ही होती है। इसके अतिरिक्त अनुभूति के लिये और कोई तथ्य नहीं है। सान्निध्यात्मक रति जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति की परस्परता में होती है। इसके अतिरिक्त सान्निध्यात्मक रति के लिए और कोई वस्तु नहीं है। मानव के चारों आयामों एवं दश सोपानीय परिवार सभा व्यवस्था की एकसूत्रता एवं एकात्मता समाधान एवं अनुभूति में, से, के लिए है। धार्मिक, आर्थिक एवं राज्यनैतिक की अन्योन्याश्रयता भी अनुभूति एवं समाधान ही है। धार्मिक, आर्थिक एवं राज्यनैतिक की अन्योन्याश्रयता भी अनुभूति एवं समाधान ही है। समाधानात्मक भौतिकवाद, व्यवहारात्मक जनवाद एवं अनुभवात्मक अध्यात्मवाद भी अनुभूति एवं समाधान ही है। समाधान एवं अनुभूति के अभाव में मानव जीवन पराभवित, कुण्ठित एवं प्रतिक्रान्तित पाया जाता है। अर्थ समुच्चय का सदुपयोग एवं सुरक्षा क्रिया-प्रक्रिया भी अनुभव एवं समाधान में, से, के लिए है। मानव जीवन की आद्यान्त उपलब्धि अनुभव एवं समाधान ही है। तन-मन-धन की चरितार्थता अनुभव एवं समाधान में, से, के लिए है। प्रत्यक्ष रूप में अर्थ की विपुलता समाधान एवं सामाजिक व्यवहारीयता ही अनुभूति है। समाधान एवं अनुभूति के अभाव में वे दोनों उपलब्धियाँ प्राप्त नहीं होती है। अनुभव एवं समाधान का योगफल ही जीवन चरितार्थता है। यही दृढ़ता एवं अभयता है। अर्थ का सदुपयोग एवं सुरक्षा मानव का अभीष्ट है। यही इसकी