सार्वभौमिकता का प्रमाण है। वास्तविकताएं सार्वभौमिक हैं। अर्थ का सदुपयोग शिष्टता की सीमा में प्रमाणित होता है। शिष्टताएं अनुभव में प्रमाणित होती हैं। प्रमाण विहीन जीवन के सफल होने की संभावना नहीं है। प्रमाण विहीन जीवन स्वयं में क्षोभ, खेद, तृष्णा एवं पिपासा है। यही वास्तविकता की ओर संक्रमित होने के लिए बाध्यता है। सफलता की संभावनाएं वास्तविकता पर आधारित प्रक्रिया, पद्धति एवं नीति हैं। वास्तविकताएं विकास क्रम में नि:सृत सृष्टि है। विकास क्रम का अभाव पूर्णता पर्यन्त नहीं हैं। विकास एवं जागृति की श्रृंखला में ही मानव मानवीयता एवं समाज सामाजिकता एक वास्तविकता हैं, जिसके सुदृढ़ आधार पर ही राज्य में एकात्मकता एवं समाज की अखण्डता सिद्ध होती है। उसे पा लेना ही सामाजिक चरमोपलब्धि है। उसके लिए यह सर्वोत्तम समय है। भौतिक विज्ञान की उत्कर्षता ने शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंधेन्द्रियों की जो स्वभाव गति मानव में पायी जाती है उसकी बहुगण संख्या में वृद्धि कर दी है। फलत: आकाँक्षा द्वय संबंधी वस्तुओं के निर्माण में विपुल गति प्राप्त हुई है। इसकी अक्षुण्णता की वाँछा भी मानव में है। यह अक्षुण्ण्ता युद्ध, आतंक, द्रोह एवं विद्रोह में संभव नहीं है। ये सब अपव्यवता के द्योतक हैं। अपव्ययता से अनिष्ट घटना अवश्यंभावी है। अस्तु, व्यवहार विज्ञान को पूर्णतया शिक्षा में समाविष्ट करना उसके संरक्षण एवं संवर्धन योग्य व्यवस्था प्रदान करना ही अनिष्ट को इष्ट में परिवर्तित करने का एकमात्र उपाय है।
“विधि पालन कामना मानव में पायी जाती है।” कामना को इच्छा में, इच्छा को तीव्र इच्छा में, तीव्र इच्छा को संकल्प में, संकल्प को संभावना में, संभावना को सुगमता में, सुगमता को उपलब्धि में, उपलब्धि को अधिकार में, अधिकार को स्वतंत्रता में, स्वतंत्रता को स्वत्व में, स्वत्व को व्यवहार एवं उत्पादन में चरितार्थ करना ही शिक्षा एवं व्यवस्था का आद्यान्त कार्यक्रम एवं उपलब्धि है। यही विधि पालन क्षमता को स्थापित करने का प्रधान लक्षण कार्य प्रमाण है। व्यक्ति में जागृति सहज स्वतंत्रता ही विधि पालन क्षमता का द्योतक है। विधि पालन के बिना व्यक्ति में संयमता सिद्ध नहीं होती है। विधि पालन के बिना जागृति प्रमाणित नहीं है। जागृति के बिना स्वतंत्रता का अर्थ नहीं है। स्वतंत्रता की निरर्थकता ही मूल्यानुभूति योग्यता में न्यूनता है। यह न्यूनता ही भय एवं अज्ञान है। अज्ञान एवं भ्रम ही दिशा विहीनता है। ये सब केवल जागृति में अपूर्णता के द्योतक हैं। अज्ञान एवं भ्रम ही दिशा विहीनता है। ये सब केवल जागृति में अपूर्णता के द्योतक हैं। अपूर्णतावश ही गलती एवं अपराध का होना पाया जाता है। इससे मुक्त होने के लिए ही प्रत्येक मानव संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था में समर्पित होता है। उसका सम्मिलित रूप ही शिक्षा है। ऐसी उपलब्धि ही शिक्षा में पूर्णता का प्रमाण है। शिक्षा में पूर्णता ही