मानव में आवश्यकीय जागृति के लिए प्रेरणा एवं दिशादायी तत्व है। ऐसी उपलब्धि के लिए मानव अनवरत तृषित है। शुभ कामनाओं को चरितार्थ करने के लिए शिक्षा, दीक्षा एवं वातावरण ही प्रधानत: आधार एवं दायी है। इन्हीं से मानव में गुणात्मक परिवर्तन होना वांछित उपलब्धि है। यही जीवन दर्शनकारी कार्यक्रम है। शिक्षा-दीक्षा एवं कृत्रिम वातावरण भी संस्कारदायी है। कृत्रिम वातावरण एवं शिक्षा ही मानव के उत्थान एवं पतन का प्रधान सहायक तत्व हैं। प्रत्येक व्यक्ति व्यवस्था से संबद्ध है ही। व्यवस्था विहीन जीवन नहीं है। कृत्रिम वातावरण आकाँक्षा द्वय संबंधी साधनों सहित सकारात्मक प्रचार, प्रदर्शन, प्रकाशन के रूप में दृष्टव्य है। आशित, अनिवार्यता, उपयोगिता एवं सुन्दरता का प्रत्यक्षीकरण पूर्वक जनजाति में बोधगम्य हृदयंगम सहित प्रोत्साहित करना ही कृत्रिम वातावरण का कार्यक्रम है। यह मानव से ही नियति के अनुसार निर्मित होता है। कृतिपूर्वक मूल्य त्रयानुभूति में निष्ठा का निर्माण करना ही कृत्रिमता की चरितार्थता है, जिसमें आकाँक्षा द्वय सीमानुवर्ती उत्पादन योग्य योग्यता को, मानवीयतापूर्ण व्यवहार एवं आचरण योग्य क्षमता को स्थापित करने में कृत्रिम वातावरण सफल अन्यथा असफल सिद्ध हुआ है। उत्पादन में अप्रवृत्ति एवं व्यवहार में दायित्व वहन में विमुखता एवं अतिभोग में तीव्र इच्छा ही लोक वंचना, प्रवंचना एवं द्रोह का प्रधान कारण है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव में साम्यत: पायी जाने वाली इच्छाओं को चरितार्थ करने के लिए मानवीयता पूर्ण संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था ही एकमात्र उपाय है।
“विधि विहित जीवन ही पाँचों स्थितियों एवं दश सोपानीय परिवार सभा व्यवस्था में सफल है।” शिष्ट मूल्य और मूल्यवत्ता का संयुक्त स्वरूप ही विधि है। मानव में अनुभव एवं समाधान का संयुक्त स्वरूप ही मूल्य व शिष्ट मूल्यवत्ता है। अनुभव एवं समाधान और न्याय का परावर्तन ही व्यवहार, व्यवस्था एवं उत्पादन का प्रमाण है। मानवीयता “नियम त्रय” पूर्वक “कार्यक्रम त्रय” सहित नवधा स्थापित मूल्य, नवधा शिष्ट मूल्य एवं द्विधा वस्तु मूल्य में किया गया विनियोग ही विधि है। विनियोग का तात्पर्य ही प्रयोग, व्यवहार एवं अनुभव सुलभ हो जाने से है। यह “सुलभ त्रय” शिक्षा एवं व्यवस्था से होता है। यही विशिष्टता है। विशिष्टता ही शिक्षा एवं दीक्षा द्वारा प्रभावशील होता है। यही अनुभव परंपरा को स्थापित करता है। यही अनुभव प्रमाण को सिद्ध करता है। ऐसी प्रभावशीलन प्रक्रिया ही अभ्युदय है। जागृति, समाधान, अनुभव, अभय, अखण्डता, समाज, राज्य, असंदिग्धता, सुरक्षा, सदुपयोग एवं समृद्धि क्षमता ही प्रबुद्धता का प्रत्यक्ष रूप है। प्रबुद्धता, प्रतिभा और व्यक्तित्व का समग्र रूप है। जीवन में इसका प्रकट हो जाना ही सफलता है। यही भौमिक स्वर्ग है, जिसके लिए ही मानव चिर प्रतीक्षु है। इसकी सफलता,