है, जबकि अनेक से किया गया अपराध एक को भी स्वीकार कराने में समर्थ नहीं रहा। वे स्वयं उसको अस्वीकार किए रहते हैं। अपव्यय एवं अपराध मानव की वांछित उपलब्धि नहीं है। यही सत्यता बाध्य करती है कि मानव मानवीयता पूर्ण जीवन यापन करें। मानवीयता पूर्ण जीवन में ही औचित्यता चरितार्थ होती है। गुणात्मक परिवर्तन के लिए औचित्यता का निर्णय एवं उसके अनुसार आचरण अनिवार्य है। सम्पूर्ण प्रकार के अपव्यय मानवीयतापूर्ण जीवन में समाप्त हो जाते हैं। फलत: भौतिक समृद्धि एवं बौद्धिक समाधान है। अपव्यय एवं अज्ञान के बिना मर्ध्यता एवं समस्या नहीं है। मर्ध्यता का तात्पर्य असमृद्धि एवं अभावता से है। वर्तमान में मानव के लिए आवश्यकीय वस्तुओं की निर्माण क्षमता उनमें पर्याप्तता के निकटवर्ती है। केवल व्यवहारिक आकाँक्षा का पूर्ण होना ही समाज वैभव सिद्धि है। सामाजिक वैभवता बौद्धिक समाधान एवं भौतिक समृद्धि ही है। आवश्यकता से अधिक उत्पादन ही भौतिक समृद्धि का प्रत्यक्ष रूप है। यही समाधानात्मक भौतिकवाद का आधार है। स्थापित संबंधों का विधिवत् निर्वाह ही व्यवहार आकाँक्षा का आशय है। यही व्यवहारात्मक जनवाद का सूत्र है। स्थापित मूल्यों की अनुभूति योग्य क्षमता सम्पन्नता ही या सम्पन्न कार्यक्रम ही अनुभवात्मक अध्यात्मवाद का सूत्र है। अनुभव, समाधान, व्यवहार एवं समृद्धि मानव जीवन के अविभाज्य भाग हैं। इनमें से किसी एक का अभाव होने पर जीवन गति कुण्ठित होना अथवा इनकी परस्परता में असंतुलन होना पाया जाता है।
“आवश्यकताएं परिवार मूलक हैं।” परिवार के अभाव में आवश्यकता का उद्गम प्रमाणित नहीं है। एकाकी मानव जीवन का इतिहास एवं चरितार्थता नहीं है। मानव जीवन के इतिहास एवं चरितार्थता का समाज एवं सामाजिकता की अपेक्षा में अध्ययन होता है। एक से अधिक होने की स्थिति में परस्पर अपेक्षा का उद्गमन संभव होता है। संपूर्ण अपेक्षाएं परस्परता में, से, के लिए ही ज्ञातव्य एवं दृष्टव्य हैं। व्यवहार का अभाव उसी भूमि पर होगा जहाँ मानव का अभाव है। विकास के क्रम में इस धरती पर भी मानव का अभाव रहा ही होगा। साथ ही यह कल्पना भी होती है कि जब कभी भी इस पृथ्वी पर मानव का अवतरण हुआ, एक से अधिक हुआ है। यह वास्तविकता स्पष्ट है कि एक से अधिक एकत्रित हुए बिना मानव परंपरा सिद्ध नहीं होती। इस श्रृंखला में यह निश्चय होता है कि मानव जीवन में आवश्यकताएं उनके संबंध एवं संपर्क की विशालता के अनुरूप पायी गई हैं। उसी की पूर्ति हेतु समस्त योजना-परियोजना दृष्टव्य है। ऐसी आवश्यकताएं व्यवहारिक एवं वस्तु मूल्यों से लक्षित हैं, जिनमें से किसी एक का अपूर्ण होना दूसरे के सदुपयोग व सुरक्षा में हस्तक्षेप होना है। व्यवहारिक प्रमाणों में अंतर्विरोध नहीं है। प्रमाण