सामाजिकता सिद्ध नहीं होती है। अस्तु, मानवीयता पूर्ण जीवन पद्धति, प्रणाली, नीति, आचरण एवं व्यवहार से ही सर्वमंगल, नित्य शुभ एवं जीवन सफल होता है।
“भोगों में संयमता के लिए पुरूषों में यतित्व एवं स्त्रियों में सतीत्व अनिवार्य है।” यतित्व का तात्पर्य यत्नपूर्वक तरने से तथा सतीत्व का तात्पर्य सत्वपूर्वक तरने से हैं। जागृति की ओर श्रद्धा एवं विश्वासपूर्वक यत्न-प्रयत्नशील होना ही यतित्व का लक्षण है। विकास एवं जागृति में निष्ठा एवं विश्वास सम्पन्न होना ही सतीत्व का प्रधान लक्षण है। विकास एवं जागृति ही जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति का अभीष्ट है। नियति क्रमानुषंगिक ही यतित्व एवं सतीत्व की अनिवार्यता, उपादेयता, उपयोगिता एवं अपरिहार्यता स्पष्ट होती है। विकास में व्यतिरेक अर्थात् प्रतिक्रांति अर्थात् ह्रास जो जीवन शक्तियों का अपव्यय होने से होता है जो अज्ञान, अत्याशा, आलस्य, अभिमान, भय, संग्रह, द्वेष और काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य के रूप में प्रत्यक्ष होता है। इसके स्थान पर जागृति के क्रम में मानवीयता निर्विरोध, सद्व्यय, ज्ञान, विवेक, संयत आशा, उत्साह, सरलता, अभय, असंग्रह, स्नेह निष्पन्न होता है। फलत: षड्विकार का शमन होता है। परिणामत: जीवन जागृति में निरंतरता होती है। इसी से विकास में श्रद्धा एवं विश्वास दृढ़ होता है। अमानवीय जीवन में गुणात्मक परिवर्तन में विश्वास नहीं हो पाता। गुणात्मक परिवर्तन पूर्वक क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता की उपलब्धि जीवन चरितार्थता है। यही श्रेय, नि:श्रेय एवं यतित्व तथा सतीत्व की उपलब्धि है। प्रत्येक मानव में यतित्व एवं सतीत्व के प्रति वांछनीय एवं आवश्यकीय निष्ठा का होना ही अभ्युदय का लक्षण है। यह शिक्षा एवं दीक्षा संस्कार पूर्वक सफल होता है। यह जागृति की ओर तीव्र निष्ठा का प्रतीक है, जिसका प्रत्यक्ष रूप गुणात्मक परिवर्तन है। मानवीयता के अनन्तर गुणात्मक परिवर्तन देव मानवीयता एवं दिव्य मानवीयता के रूप में प्रकट होता है। मानवीयता में अपव्ययता की संभावना नहीं है यही तथ्य मानवीयता पूर्ण जीवन के अनन्तर गुणात्मक परिवर्तन की सुदृढ़ संभावना को स्पष्ट करता है। वैचारिक विकृतियों के बिना अर्थ के अपव्यय की संभावना नहीं है। मूल प्रवृत्तियों का परिष्कार ही चैतन्य क्रिया में गुणात्मक परिवर्तन है। परिष्कृत मूल प्रवृत्ति मानवीयता एवं अतिमानवीयता को प्रकट करती है। यह पूर्णतया संस्कारों पर आधारित प्रक्रिया है। संस्कार संस्कृति का देय है। संस्कृति शुद्धत: मानवीयता सहज रूप में स्पष्ट होती है। अमानवीय जीवन में संस्कृति स्थापित होना संभव नहीं है। अतिमानवीयता पूर्ण जीवन भी मानवीयता पूर्वक ही संस्कृति को अभिव्यक्त करता है। संस्कृति ही सामाजिकता है। मानव संस्कृति यतित्व एवं सतीत्व का लक्षण है। सतीत्व एवं यतित्व मानव संस्कृति के लक्षण है। यतित्व एवं सतीत्व पूर्ण जीवन में तन-मन-धन रूपी अर्थ