के अपव्यय का अत्याभाव होता है। सदुपयोगिता ही जीवन का प्रधान कार्यक्रम है। अपव्यय एवं सद्व्यय के मूल में विचार का होना पाया जाता है। मानवीयता की अपेक्षा में सद्व्ययता एवं अपव्ययता का निर्णय होता है। सदुपयोग मानव सहज अपेक्षा है। मानवीयता में ही यह चरितार्थ होता है। यही मानवीय परंपरा में अक्षुण्णता को स्थापित करता है। मानवीयता पूर्ण परंपरा का पराभव नहीं है। अमानवीयता पराभव से मुक्त नहीं है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यतित्व एवं सतीत्व के मूल में शुद्धत: तन-मन-धनात्मक अर्थ के सदुपयोग में निष्ठा एवं विश्वास ही है। यही सत्यता मानवता के वैभव को कीर्तिमान सिद्ध करता है। इसका सर्वसुलभ हो जाना ही अखण्डता है, जिसमें ही भूमि स्वर्ग, मानव देवता, धर्म सफल एवं नित्य मंगल होता है।
“भोगों में संयमता के बिना धार्मिक, आर्थिक एवं राज्यनैतिक संतुलन संभव नहीं है।” भोगों में संयमता ही प्रत्यक्ष रूप में अर्थ का सुदपयोग एवं सुरक्षा है। अर्थ की सुरक्षा एवं सदुपयोग ही धार्मिक, आर्थिक, राज्यनीति की अन्योन्याश्रयता है। सदुपयोग के बिना सुरक्षा एवं सुरक्षा के बिना सदुपयोग सिद्ध नहीं होता है। मानव का होना, समाज का होना; समाज का होना, अर्थ का होना; सुरक्षा का एवं सदुपयोग का होना है। यही मानव का विस्तार है। मानव में कार्यक्रम समाया हुआ है। इससे अधिक मानव नहीं है, इससे कम में भी मानव नहीं है। ये सब स्वयं में प्रमाण है। अर्थ का विद्रोह होना भावी है। द्रोह, विद्रोह क्रियाकलाप में सदुपयोग का क्षरण होना पाया जाता है। इस प्रकार सदुपयोग के साथ सुरक्षा नहीं होने से सदुपयोग की अक्षुण्णता सिद्ध नहीं हुई। सुरक्षा हो, सदुपयोग न हो यह अराजकता है। अराजकता व्यक्तिगत निर्णय का द्योतक है। अराजकता स्वयं में असामाजिक है ही। इसके दमन हेतु बल का प्रयोग होता है जिससे विकास का क्षरण होता है। इससे स्पष्ट होता है कि सुरक्षा एवं सदुपयोग में से किसी एक का अभाव होने मात्र से दूसरे की स्थिति शुद्ध रूप में रहनी संभव नहीं है। दलन-दमनात्मक उपाय सदुपयोग या सुरक्षा को स्थापित करने में समर्थ नहीं होता है। विगत की घटनाएं इसकी साक्षी है। सुरक्षा को सदुपयोग में परिवर्तित करने के लिए शिक्षा, प्रचार, प्रदर्शन, प्रकाशन, उद्बोधन, परिचर्चा एवं सद्व्ययता का मूल्यांकन करने योग्य व्यवस्था ही प्रधान उपाय है। बल प्रयोगात्मक दण्ड एवं वध विध्वंसात्मक दण्ड से अपव्ययता को सद्व्ययता में परिवर्तित करने का प्रमाण सिद्ध नहीं हुआ। ताड़न, प्रताड़न, वध एवं विध्वंस जैसे क्रूर दण्ड किसी सीमा तक आतंक का निर्माण करते हैं। आतंक स्तंभित करने का एक उपाय है न कि गुणात्मक परिवर्तन का। सदुपयोग में परिवर्तित करना मूलत: संस्कार में गुणात्मक परिवर्तन होता है। गुणात्मक परिवर्तन “नियम त्रय” संबद्ध वस्तु विषयात्मक तथ्य को बोधगम्य एवं हृदयंगम कराने से होता है। यही अपव्ययता को