सद्व्ययता में परिवर्तित करने का प्रमाण है। सदुपयोग होते हुए उसकी सुरक्षा न होने का मूल कारण व्यवस्था पद्धति, प्रणाली एवं नीति में अपूर्णता का द्योतक है। इनकी अपूर्णता को पूर्णता में परिवर्तित करने के लिए किसी एक इकाई द्वारा विशेष प्रयास पूर्वक मानवीयता में पाये जाने वाले वास्तविक तथ्यों का उनमें समावेश करना ही उपाय है। प्रत्येक मानवीय व्यवस्था अर्थ का संरक्षण प्रदान करने के लिए संकल्पित है। साथ ही संवर्धन करने की आकाँक्षा भी समायी रहती है। व्यवस्था के कार्य सीमान्तर्गत जो जनजाति है उनमें अर्थ के सदुपयोग को अपने व्यवहार पूर्वक सिद्ध करने योग्य क्षमता को स्थापित करने की प्रक्रिया ही सदुपयोग में प्रवर्तन है। इस प्रवर्तन प्रक्रिया को अत्यधिक गतिशील करना ही ऐसी क्षमता का विपुल होना है। यही शिक्षा की प्रधान उपलब्धि है। अर्थ की सदुपयोगात्मक क्षमता से संपूर्ण जनजाति संपन्न होने तक व्यवस्था पद्धति में क्रूर दण्ड विधान का होना समाहित है क्योकि यह आतंक पूर्वक अपराध गति को स्तंभित करता है। इस स्तंभन प्रक्रिया की उपादेयता तब तक रहेगी जब तक संपूर्ण जनजाति मानवीयता पूर्ण जीवन में संक्रमित न हो जाय। ऐसी संक्रमण प्रक्रिया के लिए मानवीयता को प्रस्थापित करने योग्य समृद्ध शिक्षा प्रणाली, पद्धति एवं नीति है। इसी लोकोपकारी व्यवस्था से ही न्याय प्रदायी क्षमता की स्थापना होती है। उसका संरक्षण होना ही न्याय व्यवस्था एवं शिक्षा की उपलब्धि है। इसके सर्वसुलभ होने के अनन्तर क्रूर दण्ड व्यवस्था की निरर्थकता सिद्ध होती है। ऐसी शिक्षा व्यवस्था एवं मानवीयता से परिपूर्ण जनजाति का होना ही मानव की पाँचों स्थितियों में सफलता है। यही मानवीयता की चरितार्थता है। यही नित्य मंगल एवं शुभ है।
“मानव स्वधर्म प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होने के लिए बाध्य है।” यह बाध्यता जागृति क्रम में पायी जाने वाली वास्तविकता है। वर्तमान में व्यक्ति, परिवार या किसी वर्ग का अपनी विशेषता के साथ अथवा मानवीयता के साथ सुरक्षित रहना संभव नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति परिवार एवं वर्ग मानव सीमानुवर्ती संपर्क या संबंध से संबद्ध हुआ है क्योंकि प्रत्येक वर्ग एवं परिवार अपने में स्वतंत्र नहीं है या समग्र से संपर्क रहने तक उसका अपने में सीमित होना संभव नहीं है। इस संपर्क का मूल तत्व व्यवहार एवं उत्पादन ही है जो अनुभूति एवं समाधान का प्रकटन है। भ्रमवश परस्पर संपर्क एवं संबंध के लिए व्यापार ही प्रधान तत्व सिद्ध हुआ है। भ्रमित मानव में व्यवहार गौण है जबकि व्यवहार संबंध मानव जीवन में प्रधान है। यह वास्तविकता इस तथ्य को स्पष्ट करती है कि व्यवसाय संबंध पूर्वक मानव का अपने में एकात्मकता, एकसूत्रता एवं तारतम्यता सहित निर्विषमता को पाना संभव नहीं है। लघु मूल्य गुरु मूल्य को नियंत्रित नहीं करता है। यह वास्तविकता है। मानव अनुभव से विचार का, विचार से व्यवहार का एवं व्यवहार से उत्पादन