असामाजिकता की संभावना है। इस विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि प्रतिभा एवं व्यक्तित्व का संतुलन मानव जीवन में एक अनिवार्य तत्व है। मानवीयता पूर्ण आचरण ही सद्व्यवहार है।
“मूलत: मानव जीवन में विरोध व्यक्तित्व एवं प्रतिभा का असंतुलन ही है।” यह अंतर्विरोध एवं बहिर्विरोध है। अंतर्विरोध बहिर्विरोध में प्रकट होता ही है। बहिर्विरोध अंतर्विरोध के कारण होता है। प्रतिभा का परिचय व्यवहार में, उत्पादन का परिचय उपयोग में अर्थात् व्यवसाय में एवं व्यक्तित्व का परिचय व्यवहार में होता है। प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति का अंतर्विरोध व्यक्तित्व विहीनतावश एवं व्यक्तित्व पूर्ण मानव का बहिर्विरोध प्रतिभा के न्यूनतावश होता है। उत्पादन में न्यूनतावश व्यक्तित्व में विशालता नहीं है। उत्पादन क्षमता के साथ व्यक्तित्व की न्यूनता सामाजिक सिद्ध नहीं है। व्यक्तित्व की ख्याति प्रतिभा पूर्वक, प्रतिभा का नियंत्रण व्यक्तित्व पूर्वक होता है।
“प्रतिभा एवं व्यक्तित्व का संतुलित जीवन ही समाज, सामाजिकता एवं अखण्डता है।” यही संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था की एकात्मकता है।
“सिद्धान्त विहीन पद्धति से संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था की सार्वभौमिकता होना संभव नहीं है।” सार्वभौमिकता सिद्धान्त ही है। सिद्धान्त वास्तविकता है। जो जैसा है वही उसकी वास्तविकता है। प्रत्येक इकाई में रूप, गुण, स्वभाव एवं धर्म से अधिक अभिव्यक्ति नहीं है। इनमें से कोई कम हो, इकाई हो, ऐसा कोई प्रमाण नहीं है। जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति श्रम गति परिणामशीलता के रूप में दृष्टव्य है। यही वास्तविकता है। प्रत्येक वास्तविकता सघन क्रम पूर्वक अभिव्यक्ति है। क्रम ही नियति है। नियति ही विकास गति श्रृंखला है। प्रकृति श्रम-गति-परिणाम है। इकाईयों का समूह है। संपूर्ण इकाईयाँ जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति के रूप में दृष्टव्य है। प्रत्येक इकाई अपनी वास्तविकता से संपन्न है। वास्तविकताओं का दर्शन मानव ही करता है। मानव में ही दर्शन क्षमता अभिव्यक्ति हुई है। यही दर्शन क्षमता जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति का विश्लेषण करती है। फलत: “प्रमाण त्रय” स्थापित होता है। प्रमाणों के आधार पर ही सिद्धांतों का प्रतिपादन होता है। सिद्धांतों के आधार पर ही संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था सिद्ध होती है। प्रकृति का मूल सिद्धांत श्रम, गति एवं परिणाम ही है। इसी सिद्धांत के आधार पर “पूर्णता त्रय”, “तात्रय”, “काल त्रय”, “क्रिया त्रय”, “अवस्था चतुष्टय” के विश्लेषण पूर्वक मानव के चतुरायाम एवं पाँचों स्थितियाँ स्पष्ट हुई हैं। फलत: अवस्था चतुष्टय की वास्तविकताओं पर धर्म एवं स्वभाव का स्पष्टीकरण हुआ है। यही सिद्धांत की गरिमा है। सिद्धांत ही वादाविवाद, संशय,