सामाजिक कार्यक्रम प्रधानत: संवेदनशीलता व संज्ञानीयता की अभिव्यक्ति है, यही प्रयोजन है। संज्ञानीयता ही आयोजन का प्रधान कारण है। संज्ञानीयता के अभाव में आयोजनात्मक कार्यक्रम सफल नहीं है। आयोजनात्मक कार्यक्रम ही सामाजिकता को स्पष्ट करता है। आयोजन मानव के चारों आयामों एवं पाँचों स्थितियों के अर्थ में चरितार्थ होता है। यही प्रमाण मूलक दश सोपानीय परिवार सभा व्यवस्था होने से परंपरा है। प्रमाण मूलक न होने से वर्ग की अभिव्यक्ति है। परंपरा में प्रमाण मूलक चिन्तन का होना अनिवार्य है। यही सफलता का द्योतक है। इसके अभाव में आयोजन नहीं है। आयोजन में व्यवहारिकता का निर्धारण होना ही प्रधान तत्व है। व्यवहारिकता अनुभव मूलक होने से ही सफल होता है। फलत: समाज संरचना स्पष्ट होता है अर्थात् संबंध एवं संपर्क के प्रति दायित्व एवं कर्त्तव्य निर्वाह होता है। फलत: समाज की अखण्डता एवं अक्षुण्णता सिद्ध होता है। आयोजन की चरितार्थता अखण्डता में ही है न कि विघटन में। संपूर्ण आयोजन मानव धर्मीयता को प्रसारित करने के लिए बाध्य है। मानव धर्मीयता सार्वभौमिक है। मानव संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था के रूप में ही मानव धर्मीयता प्रसारित होता है।
योजनाएं उत्पादन-विनिमय के संबंध में होती हैं जो साधन नियोजन सहित परियोजना में परिवर्तित होता हैं। व्यवसाय में उत्पादन ही प्रमुख उद्देश्य है। आयोजन में विनियोग संबंधी, योजना में नियोजन संबंधी निश्चय, निर्णय, संभावना, व्यवहारिकता एवं प्रमाण सम्मत होना आवश्यक है। प्रमाण परंपरा पूर्वक ही आयोजनात्मक एवं योजनात्मक कार्यक्रम सफल होता है। आयोजनात्मक कार्यक्रम अर्थ के सदुपयोगात्मक एवं सुरक्षात्मक तथ्य को स्पष्ट करता है। यही आयोजन का मूल तत्व एवं मूल लक्ष्य है। इसे सफल बनाने के लिए ही ऐतिहासिक प्रेरणा भी सहायक होता है। इन ऐतिहासिक स्मरण परंपराओं में सामाजिकता ही उत्प्रेरक तत्व है। वर्गीयता के आवेश से मानव का ऐतिहासिक सिद्ध होना संभव नहीं है। प्रत्येक आयोजन मानवीयता पूर्ण अथवा अतिमानवीयता पूर्ण संचेतना से ही सफल होता है अन्यथा असफल होता है।