अध्ययन क्षमता चैतन्य क्रिया में स्पष्ट है। मानव का मूल रूप अध्ययन क्षमता ही है। अध्ययन क्षमता ही व्यवहार पूर्वक व्यक्तित्व एवं प्रतिभा के रूप में प्रकट होती है। अध्ययन प्रमाणिकता को स्थापित करता है। प्रमाणिकता की परंपरा होती है। यही अध्ययन है। प्रमाण विहीनता प्रतिभा एवं व्यक्तित्व का सहायक तत्व नहीं है। यह अज्ञान एवं अक्षमता का ही द्योतक है। अक्षमता एवं अज्ञान का निवारण विधिवत् अध्ययन से होता है। उदय ही गुणात्मक परिवर्तन व परिमार्जन के लिए बाध्यता है। शिक्षा एवं व्यवस्था ही उदय के लिए समर्थ प्रेरणा है। सत्ता में सम्पृक्त जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति ही उदय सर्वस्व है। यह प्रत्यक्ष, अनुमान एवं आगम क्रिया के रूप में ज्ञातव्य है। यही आद्यान्त वास्तविकता है। वास्तविकता का ही उदय होता है। उसके प्रति भ्रम होना मानव में अक्षमता का द्योतक है। प्रत्येक मानव की क्षमता परावर्तन, परिवर्तन एवं प्रत्यावर्तन के रूप में स्पष्ट है। प्रत्यावर्तन अनुभव के रूप में, परिवर्तन धन-ऋणात्मक रूप में तथा परावर्तन व्यवहार एवं उत्पादन के रूप में होता है। इससे अधिक मानव का प्रकटन नहीं है। गुणात्मक परिवर्तन पूर्वक ही मानव क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता से सम्पन्न होता है। यही उदय की आद्यान्त चरितार्थता है।
“अप्रधान रूप में किया गया भोग ही उपभोग है।” मानवीयता पूर्ण जीवन में संपूर्ण भोग अवरीयता के रूप में, दिव्य मानवीयता में नगण्यता के रूप में तथा अमानवीय जीवन में अतिप्रधान रूप में होना ज्ञातव्य है। यही अमानवीयतावादी जीवन में अपव्ययता का प्रधान कारण है। विषय प्रमत्तता क्रूरता के लिए प्रधान कारण है। विषय प्रमत्तता सम्मोहनात्मक आवेश है। इसमें होने वाले व्यवधान क्रूरता में परिवर्तित होते हैं। इसी कारणवश भ्रमित मानव का सामाजिक होना संभव नहीं हैं। व्यवहार की अपेक्षा में ही भोगों की प्रधानता एवं अप्रधानता सिद्ध होती है। व्यवहारिक शिष्टता एवं मूल्यों का उपेक्षा पूर्वक किया गया भोग ही अपव्यय तथा उसमें भोग प्रवृत्ति ही प्रमत्तता है जो स्पष्ट है। शिष्टता पूर्वक ही संपूर्ण भोग संयत होता है फलत: अप्रधान होता है जो मानवीयता की सीमा में सार्थक होना स्पष्ट है। यही आसक्ति एवं अनासक्ति का तात्पर्य है। विषयों के प्रति आसक्ति एवं अनासक्ति ऐषणाओं के प्रति प्रवृत्ति एवं अप्रवृत्ति तथा अनुभूति के प्रति संकल्प ही प्रसिद्ध है।
“आयोजनात्मक, प्रयोजनात्मक एवं योजनात्मक कार्यक्रम प्रसिद्ध हैं।” आत्मीयता पूर्ण अर्थात् न्याय सम्मत पद्धति से किया गया सम्मेलनात्मक योजना ही आयोजन है। पूर्णता की अपेक्षा में या पूर्णतया परस्पर मिलन ही सम्मेलन है। आयोजनात्मक कार्यक्रम ही सामाजिक कार्यक्रम है।