प्रगतिशीलता गुणात्मक परिवर्तन के क्रम में होती है। गुणात्मक परिवर्तन जागृति के क्रम में है। मानव में विश्वास अमानवीयता से मानवीयता एवं मानवीयता से अतिमानवीयता क्रम ही है। मानवीयता से परिपूर्ण होने के अनन्तर ही प्रगतिशील कार्यक्रम आरम्भ होता है। यही अतिमानवीयता से परिपूर्ण होते तक संबद्ध रहेगा। विश्वास स्थापित मूल्यों में साम्य मूल्य है। विश्वास मूल्य की अनुभूति मानवीयता में ही होती है। विश्वास ही क्रम से पूर्ण मूल्यानुभूति पर्यन्त प्रगतिशीलता के लिए बाध्य करता है। इसी क्रम में मानव में गुणात्मक परिवर्तन होता है। फलत: वह सतर्कता एवं सजगता से परिपूर्ण होता है जो समाधान निरंतरता का आधार है। यही सामाजिकता को प्रकट करता है। साथ ही उसको प्रमाण पूर्वक अक्षुण्ण बनाता है तभी जीवन का चतुर्दिग उदय होता है। यही अभ्युदय है। संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था की एकसूत्रता ही चतुर्दिग उदय है। इनमें विषमता ही वर्ग समुदाय है। अभ्युदय विहीन जीवन सामाजिक सिद्ध नहीं होता है। अभ्युदय का प्रमाण ही स्थापित मूल्यों की अनुभूति है। अभ्युदय अर्थात् सर्वतोमुखी समाधान ही जीवन सफलता है। यही चारों आयामों एवं पाँचों स्थितियों में दश सोपानीय व्यवस्था की एकसूत्रता के लिए प्राणतत्व है अर्थात् मूल तत्व है। विश्वास विहीन प्रत्येक संबंध एवं संपर्क में दायित्व एवं कर्त्तव्य वहन सिद्ध नहीं होता है। दायित्व एवं कर्त्तव्य वहन की उपेक्षा अथवा तिरस्कार पूर्वक समाज संरचना नहीं होती है और न सामाजिकता ही सिद्ध होती है।
विशेषत: मानव के साथ प्रतिक्रिया अपराध के बिना नहीं होती है। अमानवीयतावादी जीवन में किया गया संघर्ष ही प्रतिक्रियावादी जीवन है। अमानवीयता ही संघर्ष का प्रधान कारण है। अमानवीयता की सीमा में अभ्युदय संभव नहीं है। अभ्युदय विहीन जीवन मानवीयता पूर्ण होना संभव नहीं है। अभ्युदय के लिए मानवीयता (चेतना विकास मूल्य शिक्षा कार्यक्रम ही) एकमात्र आधार है। अपराध एवं प्रतिक्रियात्मक जीवन स्वस्थ्य एवं सफल नहीं है। इसे सफल बनाने के लिए प्रत्येक मानव में वांछा पायी जाती है। इसी तथ्य वश मानव मानवीयता से परिपूर्ण होने के लिए बाध्य है।