परंपरा की अनेकताएं मनुष्य को किसी न किसी सीमा में प्रतिबद्ध होने के लिये बाध्य करती हैं। यह बाध्यता अंततोगत्वा मानव की पूर्णता में बाधक सिद्ध हुई है क्योंकि ये सभी प्रयास रहस्य से मुक्त नहीं हो सके। मानव कृत्यकृत्यता अर्थात् क्रिया की पूर्णता वर्ग सीमा में संभव नहीं है। इसी के परिहारार्थ मानवीय चेतना का उदय अवश्यंभावी है।
समाधान व न्याय विहीन विविधता भी मानव के लिये पीड़ा है क्योंकि विविधता में ही भय, सशंकता, अतृप्ति होती है जो प्रसिद्ध है। इसके समाधानार्थ एकता का चिंतन भावी है जिसकी संभावना मानवीयता में ही स्पष्ट है। आर्थिक एवं धार्मिक विविधताएं एवं विषमताएं वर्ग सीमा को स्पष्ट करती हैं इन्हीं के तारतम्य में संस्थायें हैं। संस्थाओं की विविधता के अनुरूप में जनाकाँक्षा की विविधता स्वाभाविक रूप में पायी जाती है। विविधतावश ही परस्परता में संदिग्धता एवं सशंकता पाई जाती है। प्रत्येक संस्था जनजाति को अभय प्रदान करने के लिये आश्वासन देती है जो शुद्धत: मांगलिक है। यही मांगलिक उद्देश्य सभी अवस्थाओं की संस्थाओं में पाये जाते हैं। प्राथमिक अवस्था की संस्था एकाधिकारवश, वर्गीय संस्था अपूर्णतावश परस्परता में विश्वास व स्थिरता प्रदान करने में समर्थ नहीं होती है। यही द्वन्द्व का कारण एवं पुन: गुणात्मक परिवर्तन, चिंतन एवं व्यवहारान्वयन के लिये पीड़ा है, जिनके निवारणार्थ “वाद त्रय” ही है।
अभाव या भाव पुन: प्रयासोदय का स्तुषि है। अभावता भाव के लिये, भाव पूर्णता के लिये, पराभवता विभव के लिये तृषित-व्यथित-आशित-आकाँक्षित है। यही पुन: प्रयास का कारण एवं अंकुर है। यही मूल प्रवृत्ति, संवेगपूर्वक प्रयासोद्घाटक के रूप में है। वर्ग और समुदायवादी संस्थाओं में एकाधिकारवाद, प्रभुतावाद, नायकवाद, अधिनायकवाद, बहु नायकवाद, अल्प सम्मतिवाद, बहु सम्मतिवाद के आधार पर प्रयुक्त हुए हैं। ये सब सार्वभौमिकता के अभाववश ही पराभव को प्राप्त हुए हैं या असफल हुए हैं। इनका साक्ष्य समर प्रयास है। इसलिये सतर्कता सजगता का स्पष्ट होना आवश्यक है।