वर्ग की सीमा में अखण्डता नहीं है। जब तक मानव जीवन में अखण्डता नहीं है तब तक भय से मुक्ति नहीं है। जब तक भय से मुक्ति नहीं है तब तक स्वतंत्रता नहीं है, जब तक स्वतंत्रता नहीं है तब तक अपव्ययता का अभाव नहीं है।
संपूर्ण संग्राम सामग्री, साधन तंत्र, व्यवस्था मात्र अपव्यय में, से, के लिये ही है। जबकि प्रत्येक मानव प्रत्येक स्तर में अर्थ का सदुपयोग तथा सुरक्षा ही चाहता है। यही चाहने और करने के बीच में जो दूरी है वही अंर्तद्वन्द्व, आत्मविश्वास का अभाव तथा स्वयं में स्वयं के विश्वास में सशंकता और भय का कारण है। यही पीड़ा है। अंर्तद्वन्द्व से मुक्ति के लिये प्रत्येक मानव को प्रत्येक स्तर में अर्थ का सदुपयोग एवं सुरक्षा हेतु मानवीयता में “नियमत्रय”का अनुगमन, अनुसरण एवं अनुशीलन करना ही होगा।
“सौजन्यतापूर्वक ही मानव अभयता से परिपूर्ण होता है” जिसमें अर्थ की सदुपयोगात्मक भावनायें परिपूर्णत: समाविष्ट रहती है। अर्थ का सदुपयोग होना ही सुरक्षा है। सौजन्यता सीमित नहीं है। यदि सीमित है तो सौजन्यता नहीं है। वर्ग वाद या वर्गीय संस्थानुरूप अनुसरण में शिष्टता का पूर्ण विकास होना संभव नहीं है। क्योंकि जो व्यक्ति वर्गवाद से ओतप्रोत रहता है वह उस वर्ग की सीमा में अत्यंत सौजन्यतापूर्वक प्रस्तुत रहता है एवं अन्य वर्ग के साथ निष्ठुरतापूर्वक प्रस्तुत होता हुआ देखा जाता है। इस साक्ष्य से यह सिद्ध होता है कि वर्ग की सीमा में मानव की शिष्टता परिपूर्ण नहीं है। अपरिपूर्णतावश ही स्वयं में, स्वयं का विश्वास नहीं हो पाता है। यही घटना प्रत्येक जन्म में पराभव का कारण होती है। इसे विभव की परंपरा में पाने के लिये मानवीयता ही एकमात्र शरण है।
धर्मनीति या धार्मिक भावनाएं सुदूर विगत से ज्ञातव्य हैं। यद्यपि यह ईश्वर तंत्र पर आधारित पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक की व्याख्या में आख्यायित रही है जिनका अनुसरण अनेक वर्ग या वर्ग वाद के कारण सिद्ध हुए हैं। इन धार्मिक आख्यानों पर सदा ही तर्क की गति विजरंभित रही हैं अर्थात् छायी रही हैं। तर्कसंगत पद्धति से इन आख्यानों में ईश्वर की महत्ता का वर्णन करने का प्रयास निष्ठापूर्वक हुआ है जो जनजाति में आस्था के लिये पर्याप्त आधार सिद्ध हुआ है न कि व्यवहारिक निष्ठा के लिये। इन व्याख्यानों की अनेक परंपरायें अवतरित भी हुई हैं। इन परंपराओं में जीवन की विधाओं को स्पष्ट करने के अथक प्रयास हुए हैं जो आज भी विगत पर गौरव करने के मुख्य आधार हैं। यही विशेषताएं वर्तमान में यथार्थता के प्रति भास-आभास को प्रदान करती है साथ ही उत्साह को भी।