व्यक्ति व परिवारगत स्वत्व, स्वतंत्रता, सम्पति व अधिकार विहीन व्यवस्था पद्धति का भी प्रयोग हुआ है, जो व्यक्ति में सशंकता, परिवार में संदिग्धता का प्रधान कारण हुआ है। इस प्रकार की व्यवस्था भी एकाधिकारवाद, अल्पमतवाद और बहुमतवाद के आधार पर आधारित रही हैं। ऐसी संस्थाएं भी लाभोन्मुखी एवं सम्पतिकरण प्रक्रिया से मुक्त नहीं हुई है। फलत: :-
व्यक्ति में पराधीनतावश सशंकता, एवं
यांत्रिकता के लिये विवशतावश अनिश्चयता एवं क्रांति विहीनता
वैयक्तिक विकास में अवरोधवश आतंक
मानव की प्रतिभा एवं व्यक्तित्व के असंतुलनवश संदिग्धता
व्यक्ति का उत्पादन पर स्वत्व एवं अधिकार विहीनतावश
जीवन में (स्वयम् में) अविश्वास एवं भय दृष्टव्य हैं।
ये सब प्रक्रियायें भ्रमित मानसिकता के आधार पर घटित हुई हैं जबकि सामाजिकता एवं सामाजिक संस्थाओं का मूल उद्देश्य भय मुक्ति प्रदायिता ही है। प्रत्येक राज्यनैतिक एवं धर्मनैतिक संस्था भय मुक्ति के लिये प्रतिनिधित्व करती हैं, साथ ही वाद-विवाद, विरोध एवं युद्ध साहित्य का संग्रह करती हैं, जो मूल उद्देश्य के लिये अनावश्यक या विरोधी सिद्ध हुई हैं। इसका निराकरण मात्र मानवीयतापूर्ण धर्म नीति एवं राज्य नीति का अनुसरण ही है।