सीमा में। वर्ग विचार प्रणाली दूसरे वर्ग के साथ निर्विषमता को स्थापित करने में समर्थ नहीं हुई है। इसी असमर्थतावश वह स्वहित साधन के लिये दूसरे का अहित साधन कर जाता है। यही व्यवहार, आचरण, शिक्षा एवं व्यवस्था पद्धति में प्रकारान्तर से अवतरित हो रहा है। यह समर सामग्री के संग्रह एवं समर के रूप में दृष्टव्य है। इसका निराकरण केवल मानवीयतापूर्ण चेतना सम्पन्नता में है। हर मानव मूलत: शुभ को चाहते हुए भी वर्ग समुदाय मानसिकता में ढल जाता है। इस विधि से शुभ चाहते हुए भी अशुभ कार्य के लिए हर सामान्य व्यक्ति को सहमत होना पड़ता है। सर्वाधिक व्यक्ति किसी वर्ग या समुदाय के पक्षधर हैं।
“परिवार या वर्ग के प्रत्येक सदस्य के लिये प्रत्येक समय में संकीर्णता की सीमा सहनीय सिद्ध नहीं हुई है।” इसी कारणवश सुधार की अपेक्षा में शोषण, संचय, अतिवादी भ्रमित व्यवस्था, शिक्षा एवं व्यवहार का विरोध हुआ है।
शोषण और संचयवादी व्यवस्था एवं व्यवहार अंततोगत्वा सुविधा एवं अतिभोग में प्रसक्त पाया जाता है। अतिभोग मानव के लिये क्रांतिकारी घटना नहीं है। क्योंकि :-
अतिभोग प्रवृत्ति अपव्यय से मुक्त नहीं है।
अतिभोग प्रवृत्ति चारित्रिक सिद्ध नहीं हुई है।
अतिभोग प्रवृत्ति नैतिकता को सिद्ध नहीं करती है।
अतिभोग प्रवृत्ति उत्पादन में शिथिलता का कारण होती है।
अतिभोग प्रवृत्ति लोभ और संग्रह के लिये तृषित होती है।
अतिभोग प्रवृत्ति ही प्रधानत: हीनतावादी व्यवहार एवं शोषणवादी प्रौद्योगिकी का कारण होती है। हीनता स्वयं में विश्वास का न होना है।
अतिभोग प्रवृत्ति असंतुलन का प्रधान कारण है।
अतिभोग प्रवृत्ति सामाजिक नहीं है।
“समृद्धि शुद्धत: आवश्यकता से अधिक उत्पादन ही है” न कि हीनता, दीनता, क्रूरता पूर्वक किया गया उपार्जन।