उत्पादन का सीधा संबंध विनिमय कार्य व स्वास्थ्य संयम कार्य, शिक्षा संस्कार, न्याय सुरक्षा, उत्पादन कार्य संरक्षण से हैं। इन पाँचों की एकसूत्रता उत्पादन के लिये अनिवार्य है। यही व्यवस्था का आद्यान्त कार्यक्रम है। मूल्य विहीन संबंध नहीं है। संबंध विहीन व्यवस्था एवं व्यवहार नहीं है। उत्पादन के संबंध निर्वाह में जो न्यूनताएं हैं वही लाभोत्पादक वाणिज्य के जन्म का कारण है। यह उस समय तक रहेगा जब तक उत्पादन संबंध का निर्वाह एकसूत्रतापूर्वक पूर्ण न हो जाय।
विनिमय के अर्थ में वाणिज्य चरितार्थ होता है न कि सुविधा संग्रह के अर्थ में। विनिमय उत्पादन की सहायक प्रक्रिया है। संग्रहवादी वाणिज्य उत्पादन में सहायक सिद्ध नहीं हुआ है अपितु उत्पादन में अनेकानेक विध्नों का निर्माण किया है। यही पद्धति उत्पादन में असंतुलन का कारण सिद्ध हुई है। इसका साक्ष्य उत्पादन में विमनता, उदासीनता है। साथ ही, संग्रह सुविधा प्रवृत्ति में विवशता भी है।
उत्पादन का सुगमतापूर्वक वांछित वस्तु व सेवा में परिवर्तित होना ही विनिमय की चरितार्थता है। लाभ मूलक वाणिज्य प्रक्रिया उसके विपरीत स्थिति का निर्माण करती है। यही सत्यता मानव को श्रम विनिमय पद्धति को सर्वसुलभ बनाने के लिये बाध्य की है।
लाभाकाँक्षी व्यापार पद्धति शुद्धत: विनिमय सिद्ध नहीं हुई है। क्योंकि इस पद्धति और प्रक्रिया में धन का पूंजीकरण और वस्तुओं का भंडारीकरण प्रत्यक्ष हुआ है। लाभ का प्रच्छन्न रूप ही शोषण और उसका प्रत्यक्ष रूप ही पूंजी एवं वस्तुओं का भंडार है। जीवन व्यवहार के मूल में भी शुद्ध विनिमय कामना है। यह आदान-प्रदान के रूप में दृष्टव्य है। मानव जीवन में आदान-प्रदान क्रिया का अभाव नहीं है। वह उसके लिये बाध्य है। समस्याग्रस्त जीवन मानव की वाँछा, वाँछित उपलब्धि या वाँछित घटना नहीं है। अस्तु, इसका समाधानात्मक विकल्प केवल श्रम विनिमय पद्धति का अनुसरण ही है।
उत्पादन की भागीदारी के लिये श्रम नियोजन आवश्यक है। श्रम नियोजन पूर्वक ही मानव समृद्ध होता है। मानव में श्रम निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य के रूप में समझदारी होना ज्ञातव्य है जो चैतन्य क्रिया का अधिकार है। इसी अधिकारवश जड़ प्रकृति की यांत्रिकता में वह परिमार्जन और परिणाम प्रदान करता है फलत: उपयोगिता एवं सुन्दरता प्रत्यक्ष होती है। चैतन्य क्रिया की यही क्षमता परिवारगत आवश्यकता से अधिक उत्पादन एवं समृद्धि को प्रकट करती है। चैतन्य जीवन ही अमर है। शरीर का जन्म और मृत्यु घटना है। इस तथ्य को जानने वाला भी चैतन्य इकाई ही है। मानव में श्रम का मूल रूप भी चैतन्य क्रिया ही है। इस चैतन्य क्रिया में जो