संस्कृति एवं सभ्यता के संरक्षणार्थ ही विधि एवं व्यवस्था की स्थापना है। सभ्यता संस्कृति में, से, के लिये ही सामाजिकता है। सामाजिकता के लिये ही उत्पादन, वितरण, उपयोग व सदुपयोग होना आवश्यक है। इसी कारणवश विधि व व्यवस्था का ध्रुवीकरण एवं उसकी अक्षुण्णता सर्व स्वीकार्य है। यह मानवीयता पूर्वक सफल और अमानवीयता में असफल सिद्ध हुआ है।
अर्थ संस्कृति में, संस्कृति सभ्यता में चरितार्थ होती है। अर्थ व्यवस्था से और सभ्यता विधि से सम्बद्ध है। यही सम्बद्धता उनकी अन्योन्याश्रयता को सिद्ध करती है। इसकी अक्षुण्णता मानवीयता में सफल और अमानवीयता में असफल सिद्ध हुई है। असफलता ही वर्ग संघर्ष, समर, पराभव, भय और आतंक है।
सामाजिकता औपचारिक तथ्य नहीं है अपितु जागृति पूर्वक जीने की शैली है। वह केवल वास्तविकता पर आधारित क्रियाकलाप है। वास्तविकताएं ही नियति क्रम, नियति क्रम ही विकास, विकास ही अभ्युदय, अभ्युदय ही व्यवहारिकता एवं व्यवहारिकता ही सामाजिकता है। व्यवहार संस्कृति, सभ्यता और विधि, व्यवस्था का योगफल है। मानव जीवन का आद्यान्त कार्यक्रम इसी चतुर्दिशा में वैभव है। विधि अनुभव को, संस्कृति विचार को, सभ्यता व्यवहार को, व्यवस्था उत्पादन विनिमय सहित पाँचों आयामों को स्पष्ट करती है। यह प्रमाण सिद्ध है। यही “मूल्य त्रय” को प्रकट करता है।