परिवार और साथियों की स्थिति, परिस्थिति की विवशतावश अपराध करता है। प्रौढ़-वृद्धावस्था में प्रधानत: अज्ञान, अत्याशा एवं अभाववश परिस्थिति बाध्यता पूर्वक अपराध करना प्रसिद्ध है। बाल अपराध में प्रधानत: अभिभावकों का, कौमार्य अपराध में प्रधानत: परिवार या मित्रों का, युवावस्था में परिवार या साथियों का, वृद्धावस्था में रहस्यता, नि:सहायता का होना आवश्यक है। अपराध का मूलरूप अज्ञान ही है। यही अत्याशा, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, काम, क्रोध एवं अक्षमता के रूप में क्रियाशील होता है जो स्पष्ट है। उपरोक्त वर्णन भ्रमित मानव परंपरा में स्पष्ट है। अपराध एवं निरापराध के सहायक तत्व प्रधानत: दो ही हैं :-
प्रथम :- शिक्षा, प्रचार, प्रदर्शन और प्रकाशन।
द्वितीय :- व्यवस्था, नीति, पद्धति और प्रक्रिया।
परधन, परनारी/परपुरुष एवं परपीड़ा के रूप में सामाजिक अपराध; संग्रह, द्वेष, अविद्या एवं अभिमान के रूप में वैचारिक अपराध; युद्ध, वध एवं विध्वंस के रूप में राष्ट्रीय अपराध; प्राकृतिक ऐश्वर्य का शोषण व दुरूपयोग एवं उसके संवर्धन में विघ्न के रूप में अंतर्राष्ट्रीय अपराध प्रसिद्ध है।
“अपराध मानव का लक्ष्य नहीं है।” प्रत्येक मानव न्याय पाना चाहता है, सही करना चाहता है। मानव के जीने के क्रम में “अपराध” एक घटना के रूप में दृष्टव्य है। अपराध से पाँचों स्थिति एवं चारों आयाम स्वस्थ नहीं होते हैं। अपराध अमानवीयता में सीमित प्रक्रिया है। अमानवीयता प्रकृति के विकास के क्रम में एक भ्रमित अवस्था है। यह भ्रांति पद चक्र का प्रकाशन है, इससे विकसित अवस्था ही देव पद चक्र है जिसके लिये मानव में सतत तृषा, अथक प्रयास एवं पूर्ण आकाँक्षा है। देव पद चक्र में संक्रमित होना ही मानवीयता सहज वैभव है। यही वैयक्तिक एवं परिवार की स्थिति में आचरण एवं व्यवहार है। इसका व्यवस्था एवं शिक्षा के रूप में उपलब्ध हो जाना ही मानवीयतापूर्ण समाज का प्रत्यक्ष रूप है। यह संक्रमण प्रक्रिया चेतना विकास मूल्य शिक्षा के क्रम में भावी है। अमानवीयता से मुक्ति पाने के लिये मानवीयता ही एकमात्र शरण है। मानवीयता से परिपूर्ण होने के अनन्तर यह मानव का अधिकार और स्वत्व है। यही अधिकार एवं स्वत्व, स्वतंत्रता के लिये उत्प्रेरणा है। पूर्ण स्वतंत्रता दिव्य मानवीयता में ही होती है। देव पद चक्र में संक्रमित समाज ही जागृति सहज समाज है। इससे पूर्व की स्थिति में सामाजिकतापूर्ण समाज सिद्ध नहीं है, क्योंकि अमानवीयता में सामाजिकता का पूर्ण होना संभव नहीं है। इसी कारणवश वर्ग संघर्ष का क्रम दृष्टिगोचर है।