मानवीयतापूर्ण शिक्षा व व्यवस्था की प्रस्थापना, आप्त कामना सहित प्रमाण पूर्वक विश्लेषण पूर्ण प्रक्रियाबद्ध सिद्धांतों का उद्घाटन है। यह अनुसंधान क्षमता की स्वाभाविक प्रक्रिया है। प्रत्येक जागृत इकाई में सबके जागृति के प्रति कामना जागृत होना स्वाभाविक है। इसी क्रम में प्रत्येक अनुसंधान जनसुलभ होता आया है। जिनमें यह क्षमता प्रत्यक्ष हुई है, वे आप्तपुरुष हैं। मानवीयता में ही संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था की एकरूपता सिद्ध होती है अर्थात् निर्विषमता सिद्ध होती है। यही धार्मिक, आर्थिक एवं राज्य नैतिक एकात्मकता को सिद्ध करती है, जिसके लिये ही मानव कुल प्रतीक्षारत है। यही व्यक्ति में उत्पादन, व्यवहार, विचार एवं अनुभूति के लिये अविरत प्रेरणा का स्रोत है।
शिक्षा ही मानव जीवन एवं जीवन के कार्यक्रम को विश्लेषण व व्याख्या पूर्वक बोधगम्य कराने के लिये एकमात्र सूत्र है। प्रधानत: मानव को शिष्टता विशिष्टता से पूर्णत: प्रबोधन करा देना ही शिक्षा है। साथ ही उत्पादन विनिमय कुशलता एवं निपुणता योग्य योग्यता का निर्माण करना ही शिक्षण की चरितार्थता है।