में शिष्ट मूल्य का, जागृत अवस्था में स्थापित मूल्य का अनुभव करता है। मानव में गुणात्मक परिवर्तन संज्ञानशीलता पूर्वक है यही दर्शन क्षमता के रूप में सहअस्तित्व में ज्ञान एवं अनुभूति के रूप में प्रत्यक्ष होता है। वस्तु मूल्य के संदर्भ में प्रयोग एवं उत्पादन-विनिमय, शिष्ट मूल्य के संदर्भ में व्यवहार एवं आचरण, स्थापित मूल्य के संदर्भ में स्वीकार एवं अनुभव प्रसिद्ध है। निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य ही विचार सर्वस्व है। यही संपूर्ण समाधान है। इसी का नियोजन उत्पादन एवं व्यवहार के रूप में प्रत्यक्ष होता है। यही उत्पादन एवं व्यवहार मानव के अल्प जागृति, अर्ध जागृति, जागृति और जागृति निरंतरता के रूप में स्पष्ट होता है।
“चारों आयामों की परितृप्ति ही सुख, शांति, संतोष एवं आनंद है।” यही मानव की चिरआकाँक्षा है। आवश्यकता से अधिक उत्पादन अर्थात् समृद्धि में उत्पादन-विनिमय आयाम की परितृप्ति; शिष्टता सहित आचरण से व्यवहारिक आयाम परितृप्ति; निपुणता, कुशलता एवं पाण्डित्य पूर्ण समाधान से वैचारिक आयाम की तृप्ति; पूर्ण मूल्य एवं स्थिति सत्य में निरंतरता ही अनुभवात्मक आयाम की तृप्ति है।
पूर्णता को पूर्णतया स्वीकार करने योग्य क्षमता ही अनुभव क्षमता है। यह अनुक्रम से अर्थात् जागृति क्रम और जागृति से प्राप्त प्रकटन एवं स्थिति है। इस प्रकटन के अनन्तर परिवर्तन-परिमार्जन नहीं है। यही पूर्ण जागृति है। ऐसी पूर्णता केवल तीन ही है - गठनपूर्णता, क्रियापूर्णता, आचरणपूर्णता। जिस अनुभूति के अनन्तर शंका अथवा परिवर्तन परिमार्जन होता है वह पूर्ण विकास का लक्षण नहीं है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर चैतन्य होने के समय में गठनपूर्णता जिसमें प्रस्थापन एवं विस्थापन का सर्वथा अभाव, मानवीयता में क्रियापूर्णता जिसमें मानव संस्कृति एवं सभ्यता से संदिग्धता का सर्वथा अभाव, आचरणपूर्णता में सतर्कता एवं सजगता के प्रति शंका का सर्वथा अभाव पाया जाता है। यही प्रमाण का आधार है।
पूर्ण स्वीकृति केवल स्थिति सत्य, वस्तु स्थिति सत्य एवं वस्तुगत सत्य के संदर्भ में, से, के लिए है। यही संचेतना का चरमोत्कर्ष एवं अन्तिम उपलब्धि नित्य मंगल सिद्धि है।