समाधान सम्पन्न होता है। तभी परावर्तन एवं प्रत्यावर्तन में संतुलन सिद्ध होता है। अनुभूति आत्मानुषंगी एवं अपरिवर्तनीय है। यही पूर्णता सहज व्यवहार आत्मानुषंगी एवं अपरिवर्तनीय है यही पूर्णता है। यही पूर्ण सजगता है, पूर्ण सजगता ही सहजता है। समाधान एवं अनुभूति की निरंतरता ही सामाजिक अखण्डता एवं अक्षुण्णता है। अनुभव एवं समाधान के बिना जीवन चरितार्थ नहीं है। चरित्र पूर्वक अर्थ निस्सरण ही चरितार्थता है। आचरण ही स्वभाव के रूप में प्रकट होता है। यही स्वभाव “तात्रय” में स्पष्ट है। आवश्यकता से अधिक उत्पादन के रूप में प्रयोग पूर्वक किया गया उत्पादन-विनिमय में सफल हुआ है। व्यवहार एवं उत्पादन का योगफल ही सहअस्तित्व है। उनमें निर्विषमता ही जागृति है। उसकी निरंतरता ही सामाजिकता की अक्षुण्णता है, जिसके दायित्व का निर्वहन शिक्षा एवं व्यवस्था करती है।
“परिमाण विश्लेषण पूर्वक सिद्ध होता है जो नियति सहज निर्णय है। यह निर्णय ही समाधान है। परिमाणता, फल, प्रभाव, दबाव, तरंग, वस्तु, दूरी, विस्तार, काल एवं क्रिया के रूप में गण्य होता है।” ये सब प्रयोजन एवं आवश्यकता के आधार पर उपयोगी पूरक सिद्ध हुए है। जागृत मानव की उपयोगिता या व्यवहारिकता सहज मानसिकता ही मूल्य है। उपयोगिता एवं व्यवहारिकता अन्योन्याश्रित तथ्य हैं। व्यवहारिकता स्थापित मूल्य एवं शिष्ट मूल्य पूर्वक सिद्ध होती है। वस्तु मूल्य केवल उपयोगिता एवं सुन्दरता मूल्य में सीमान्तवर्ती है। सुंदर हो, व्यावहारिक न हो, अर्थात् सामाजिकता के लिए उपयोगी न हो यह निषेध है। विश्वासघात, प्राणघात, अर्थघात, मानघात, जीवनघात ये सामाजिकता के लिए उपादेयी नहीं है। इसी आंकलनवश ये सब निषिद्ध है।
परिचय ज्ञान, व्यवहार एवं आचरणपूर्वक सिद्धि के लिए की गई प्रक्रिया ही परिमाण प्रक्रिया है। मानव में पूर्णता केवल क्रियापूर्णता एवं आचरणपूर्णता है। परिणाम-निर्णय-प्रक्रिया में कारण, गुण, गणित ही आद्यान्त आधार है। यही निर्णायक तथ्यत्रय है। कारण सहित घटनाएं, गुण सहित प्रक्रियाएं एवं मात्रा की गणनाएं प्रसिद्ध हैं। शुद्धत: परिमाण का परिणाम परमाणु की स्थिति में होता है। “रूप, गुण, स्वभाव व धर्म का संयुक्त रूप ही मात्रा है।” प्रत्येक इकाई में स्वभाव गति एवं आवेशित गति दृष्टव्य है। ह्रास के योग्य गति आवेशित गति है। आवेशित गति ही सापेक्ष शक्तियों के रूप में दृष्टव्य है। जो जड़ प्रकृति में विद्युत, ताप, प्रकाश, चुम्बक और शब्द के रूप में; चैतन्य प्रकृति में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य के रूप में स्पष्ट है। ये सब आवर्तनशीलता सूत्र प्रक्रिया पूर्वक नियंत्रित व संरक्षित होती है।