- व्यवस्था संबंध :- दश सोपानीय परिवार सभा विधि।
- परिवार संबंध :- परिवार संबंध में पति-पत्नि सहित सभी संबंध समाये रहते हैं।
प्रत्येक मानव, मानव के साथ व्यवहार करने के लिए उत्सुक है। जागृत मानव प्रधानत: मानव के साथ ही स्वयं की जागृति को प्रमाणित करता है। स्थापित संबंध में ही निर्वाह क्षमता का उपार्जन कर लेना ही शिक्षित होने की उपलब्धि है। इसकी अनिवार्यता व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय स्थितियों में साम्यत: पायी जाती है। व्यवहार स्थापित मूल्य, शिष्ट मूल्य एवं वस्तु मूल्य के योगफल में ही है। अनुभव ही मानव जीवन का प्रधान आयाम है। अन्य आयाम जैसे - विचार, व्यवहार एवं व्यवसाय अनुभव क्षमता के बिना पूर्ण नहीं होता है। अनुभव क्षमतावश ही मानव सामाजिकता के लिए उन्मुख होता है। क्योंकि :-
शीत-उष्ण; प्रकाश-अंधकार; प्रिय, हित, लाभ; न्याय, धर्म, सत्य; उचित-अनुचित; हानि-लाभ; उत्थान-पतन; ह्रास-विकास का आंकलन प्रत्येक मानव में किसी न किसी अंश में होता ही है। यही समीक्षा पूर्णता सहज निरंतरता के लिए प्रेरणा है।
अनुभव क्षमता के अभाव में मानव जीवन का विश्लेषण एवं उनके कार्यक्रम की स्थापना संभव नहीं हैं। मानव में स्थापना का तात्पर्य स्वीकृति से है। स्वीकृति ही संस्कार है। यही क्रम से मूल प्रवृत्ति एवं संवेग के रूप में अवतरित होकर क्रिया, व्यवहार, आचरण में प्रत्यक्ष होता है। अनुभव क्षमता में ही भाव और अभाव का निर्णय होता है। भाव ही उपलब्धि है। अभाव ही भाव में परिणत होने के लिये शेष प्रयास है। प्रत्येक भाव मौलिक है। प्रत्येक मूल्य मानव और उसकी धर्मियता पूर्वक प्रतिष्ठित है। इकाई और उसकी मूल्यवत्ता का वियोग नहीं है। यही स्वभाव है। यही सत्यता प्रत्येक इकाई में उत्सव है। दिव्य मानवीयता में आचरण/स्वभाव पूर्णता है। देव मानवीयता मानव यशस्वी होता है। मानव मानवीयता पूर्वक सामाजिक होता है। यही जागृति में पायी जाने वाली वास्तविकता है। प्रत्येक मानव इकाई में पूर्णता की तृषा है। परिणाम का अमरत्व, श्रम का विश्राम, गति का गन्तव्य प्रकृति के जागृति क्रम, जागृति में दृष्टव्य है।