विरोध की विजय ही सहअस्तित्व है। अमानवीयतावादी जीवन में सामान्य समाज व्यवस्था एवं शिक्षा समृद्धि पर्यन्त विरोध का अभाव नहीं है। इकाई की क्षमता में जागृति पर्यन्त विरोध का अभाव नहीं है। इकाई की क्षमता में जागृति ही गुणात्मक परिमार्जन है। प्रत्येक मानव इकाई की क्षमता ही आचरण में अभिव्यक्त होती है। अमानवीयता से मानवीयता, मानवीयता से अतिमानवीय गुणात्मक परिवर्तन सिद्ध हुआ है। मानवीयता सहज क्रिया की पूर्णता होती है। फलत: संस्कृति एवं सभ्यता में निर्विषमता एवं सतर्कता सहित सजगता पूर्ण होती है। अतिमानवीयता पूर्वक आचरण में पूर्णता होती है, फलत: सजगता प्रमाण सिद्ध होती है।
अपेक्षाकृत स्थितिवत्ता ही अनुमान का उदय है। यही अध्ययन हेतु की गई उत्सुकता है। उदय विहीन स्थिति में अध्ययन एवं अध्ययन सिद्धि नहीं है। उदय ही कौतूहल है अर्थात् जानने, मानने, पहचानने, उपयोगिता, उपादेयता एवं अनिवार्यता पूर्वक अनुभव करने की क्रिया ही उत्कंठा है। तीव्र इच्छा का उत्कर्ष ही उत्कंठा है। यही मानव जीवन में क्रियाकलापों का आधार है। अमानवीय क्रियाकलाप मानवीयता पूर्ण जीवन के कार्यक्रम में अवसानित होते हैं। मानव जीवन चार आयाम, दश सोपानीय परिवार सभा व्यवस्था एवं मूल्यों के निर्वाह के रूप में दृष्टव्य है जो संस्कृति, सभ्यता, विधि, व्यवस्था का आद्यान्त कार्यक्रम है। कौतूहल तब तक भावी है जब तक मानव जीवन और सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व का पूर्ण विश्लेषण न हो जाए, साथ ही प्रकृति के विकास एवं जीवन जागृति में रहस्य न रह जाए। यह चारों अवस्था प्रकृति की स्थिति, स्थितिवत्ता एवं उनके रूप, गुण, स्वभाव एवं धर्मवत्ता के आधार पर अरहस्यमय सिद्ध हुई है और दश सोपानीय परिवार सभा व्यवस्था मानव की स्थितिवत्ता के विश्लेषण से प्रत्येक मानव की जीवनी, जीवन का कार्यक्रम स्पष्ट हो चुका है।