जागृति क्रम ही आद्यान्त क्रम है। जागृति पूर्णता तक अनुगमन के अनन्तर पुन: अनुगमन के लिए उदय अनुस्यूत होना पाया जाता है। यही उदय के अनन्तर उदय ही जागृति की गरिमा, महिमा एवं सिद्धि है।
जागृति क्रम ही जागृतिशीलता पूर्वक प्रस्फुटित अवस्था एवं स्थिति है। यही समाधानित स्थिति है। मानव समस्या में, से, के लिए जीना नहीं चाहता है। इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि अमानवीयता जागृति की श्रृंखला में मानव जीवन के कार्यक्रम के स्तर पर उपादेयी सिद्ध नहीं हुई है या स्वीकृत नहीं हुई है। यह आंकलन मानवीयता में संक्रमित होने के लिए भी प्रवृत्ति है। मानवीयता में ही जीवन एवं जीवन जागृति सहज कार्यक्रम विश्लेषित, व्यवहृत एवं चरितार्थ होता है। समर संभावना पर्यन्त मानव सामाजिकता का सत्यापक नहीं है। इसी लाजवश पुन: समर विहीन राज्य, प्रबुद्धतापूर्ण प्रभुता से संपन्न होने के लिए ही प्रयास है। यह प्रयास वर्ग विहीन, विविध जाति विहीन तथा युद्ध विहीन प्रस्ताव है जो प्रबुद्धता पूर्ण सम्प्रभुता सिद्धि अर्थात् पूर्णता से सम्पन्न जीवन संहिता को करतलगत एवं सामान्यीकरण करते रहेगा।
अखण्ड सामाजिकता का उदय होना ही अध्ययन में पूर्णता, व्यवस्था पद्धति में दृढ़ता, व्यक्ति में आचरणपूर्णता, समाज में अभयता है। यही सर्वमंगल कार्यक्रम एवं शुभ है।