ऐसा आप नहीं बता पायेंगे। हर एक परमाणु का भागीदारी है ही है। इस ढंग से हम देखा है, इससे हम तृप्त हो गये। जो 60 के बाद 61वें परमाणु होता है, तो उस परमाणु में अंशों का संख्या कितना होता है, उसको गिनो भई! जब व्यवस्था में हमको समझ में आता है तो काहे के लिए अंशों को गिने? जब व्यवस्था में होना हमको समझ में आता है, आपका कितना हाथ है, कितना पैर है, कितना लम्बी नाक है, कितना चौड़ी कान है, इसको नापने की जरूरत है क्या? हमने ये पता लगा लिया, संकेत ठाकुर अपने में एक व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करता है।
उसी भाँति एक से अधिक अंशों से गठित हर परमाणु व्यवस्था में होता है, समग्र व्यवस्था में भागीदारी करता है, इस अर्थ को भले प्रकार से हम समझा, उसी आधार पर हम ये कहते हैं, धरती स्वयं में व्यवस्था है। ये धरती सौरव्यूह के साथ अपना भागीदारी को निर्वाह कर ही रहा है। इसको आप तो नकार नहीं पायेंगे और ये धरती की 700 करोड़ आदमी भी कुछ नहीं कर पाएगा। इस प्रमाण के साथ तृप्त होना है। इसी आधार पर हम व्यवस्था में जीने में विश्वास करता हूँ, और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने में विश्वास करता हूँ, इस विश्वास के साथ हम सुखी होना पाता हूँ, स्वयं में। और इसी ताकत से दूसरों को सुखी बनाने में हम सफल होता जाता हूँ। इसको हम सही माने या बाकी बात को - हम अंशों को गिन लिया, अंशों को तोड़ा कैसे जाए, उसके पश्चात बरबाद कैसे किया जाए - ये सब बात के लिए हमारा सोच नहीं है। क्योंकि आप का अंतिम सोच यही है, धरती को कैसे बरबाद किया जाए, कितने बार बरबाद किया जाए।
अभी सुनते हैं जितने भी बरबादी की जो स्थितियाँ बना करके रखते हैं आप लोग, आप लोग का माने विज्ञान, ये धरती को 21 बार बरबाद किया जा सकता है। ऐसा सुनते हैं, पेपरों में। आपका जकीरा कैसा बना है बर्बादी का, उसको हम को जाँचना नहीं है। बरबादी हमारा स्वीकारा नहीं हैं, आबादी हमारा स्वीकार है। कैसे हमको स्वीकार हो गया? क्योंकि नियति स्वयं आबादी की ओर प्रवर्तनशील है। नियति, नियति का मतलब -संसार में अस्तित्व, अस्तित्व में विकास, विकास क्रम में जो कुछ भी अभिव्यक्तियाँ है, ये सब का सब व्यवस्था के पक्षधर है। ये अव्यवस्था के पक्षधर नहीं है। हमारा घंटी बजाना यही प्रमुख बात है। व्यवस्था के अर्थ में हर वस्तु जब काम कर रहे हैं, हम उसको शंका करने का क्या अधिकार होता है? उसमें हस्तक्षेप करने की कौन सा अधिकार होता है, हस्तक्षेप करके किया क्या गया, कौन सा व्यवस्था को बुलंद किया? उसको भी तो कोई माईबाप बतावें। या बरबादी को आप विकास मानते हो तो आपके साथ मंगला आरती करने को हम बैठे हैं! पाँच बत्ती जला करके हम ऐसे में हैं।
प्रश्न : ये ठीक है कि अंशों को गिनने के आधार पर बहुत सारा विध्वंस हुआ है। लेकिन जो उसकी संरचना है, परमाणुओं के अंशों के रूप में, उसको समझना उपयोगी भी है। communication के जितने भी तरीका बनाये गये, computers बनाया गया, सबको बनाने का जो आधार है, ये है कि जिस मटेरियल से ये बनते हैं, उनके संरचना को ठीक-ठीक समझ पाते हैं। उसको उतना ही difuse कर पाते है, difusion का प्रक्रिया कर पाते हैं, इतने इलेक्ट्रान होगें, तो वो इस प्रकार से behave करेगा, इस प्रकार का आचरण होगा, ऐसा वो तय कर पाते हैं, उस आधार पर करीब-करीब 1 square inch पर 10 लाख प्रकार के transistor बना पाते हैं। उस आधार पर करीब 1square inch के area में ये सारा function पैदा कर पाते हैं। इस तरह का उपयोगिता तो है ही, अगर हमको परमाणु के संरचना ठीक-ठीक समझ में आ जाए, अंशों का जो विभाजन है, विभिन्न परिवेशों में वो समझ में आ जाए, उसके आधार पर उसका आचरण की निश्चितता है समझ में आ जाए, वो व्यवस्था के अर्थ में ही है ये