43. बोध साक्षात्कार
👉 विडिओ संदर्भ देखें: Video 17, time 44:10-01:02:51
प्रश्न : बोध का क्या मतलब है? पहले आप जैसे जीवन क्रिया को समझा गया, चिंतन करने से वो बोध में जाएगी, अनुभवगामी विधि से।
उत्तर : अध्ययन में जो वस्तु है, क्या? संबंध एक वस्तु है, वास्तविकता है। वास्तविकता होने के कारण एक वस्तु है। व्यापक एक वस्तु है, क्योंकि व्यापक एक वास्वविकता है, जीवन एक वस्तु है, क्योंकि जीवन एक वास्तविकता है, जीना एक वस्तु है, क्योंकि जीते ही हैं। एक वास्वविकता है।तो जो जीवन साक्षात्कार हो जाए, किसमें? चिंतन श्रेत्र मे,जीवन में। जीवन साक्षात्कार होने के लिए दूसरा कोई काँच नहीं होता है। जीवन में ही जीवन साक्षात्कार होता है। साक्षात्कार हुआ उसका बोध हो जाता है। साक्षात्कार होने के बाद ही बोध होता है। माने हम जो अध्ययन कराते हैं। शब्द छोड़ करके अर्थ में जाता है तो साक्षात्कार होता है, अर्थ साक्षात्कार हुआ। अर्थ का बोध हो गया। बोध का मतलब अर्थ स्वीकृत हो गया। ये जो साक्षात्कार हुआ उसका स्वीकृति हो गई जीवन में, वो अपना स्टॉक हो गया, इसका नाम है, समझ, जानना।जानने की बात पूरा हो गया इसी प्रकार जो जो मुद्दा है, अस्तित्व एक मुद्दा है। अस्तित्व को जानना,एक पहला बात।
प्रश्न : बाबाजी क्या ऐसा भी हो सकता है कि साक्षात्कार तो हो गया है, परंतु वो स्वीकार नहीं हो रहा है? ऐसा होता है कभी?
उत्तर : ऐसा होता नही, साक्षात्कार हुआ तो हो ही जाता है।
प्रश्न : जागृति जैसे पता चल गया क्या है, साक्षात्कार हो गया, परंतु अपना जीने की निष्ठा प्रिय, हित, लाभ में ही हैं।
उत्तर : तब तो वो बात नहीं हुआ, प्रमाणिकता का पक्षधर नहीं हुआ। साक्षात्कार ही नहीं हुआ। साक्षात्कार हुआ तो स्वीकार होता ही है।
प्रश्न : साक्षात्कार हो गया तो स्वीकृत हो गया, पर उसमे अगर प्रमाणित होने की निष्ठा नहीं हुई है?
उत्तर : अब वहाँ एक स्टॉप है। साक्षात्कार होने के बाद प्रमाणित होना है कि नहीं होना है, उसमें आपका स्वतंत्रता बनता है। साक्षात्कार बोध के पश्चात हम प्रमाणित होना चाहता हूँ, नहीं चाहता हूँ? यहाँ एक रेस्ट हाउस (rest house) है, इसको आप कन्सिडर (consider) कर सकते हैं। हम समझ गया हूँ हम प्रमाणित होने की क्या जरूरत है। ऐसा एक जगह बन सकता है, उससे प्रमाणित होना तो होगा नहीं। प्रमाण के बिना आप अपना संतुष्टि लगा सकते हैं, तो आप लगाए रखिए। यदि आप प्रमाणित होने के लिए तत्पर होते हैं वो संकल्प हो ही जाता है।
प्रश्न : जैसे साक्षात्कार हुआ, उस समय बोध होगा ही? दोनों अलग अलग क्रिया हैं, इसको कैसे समझें?