15. परमाणु - 2 (आचरण)
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अब आगे की जो बात है, किसी परमाणु को आवेशित कराने की बात आती है। आवेश को नापने की बात आती है, नापने की बात के लिए, हम कोई आवेश करने वाली चीज़ को प्रयोग किए बिना आवेश को नाप नहीं पायेंगे। आवेशित करा करके हम आवेश को नापते हैं। इसमें reality क्या हुई, सच्चाई क्या हुआ? वास्तविकता कहाँ पता लगा। हम स्वयं हस्तक्षेप करके।
प्रश्न : निश्चितता तो पकड़ में नहीं आती है, आवेशित करा के अध्ययन करेगें, तो आवेशित गति में ही करेगें।
उत्तर : उसका reality कहाँ से हमको पता लगा, इसलिए हम गुमराह हो जाते हैं शायद, उसको आप लोग अच्छी ढंग से समझते हो।
प्रश्न : हस्तक्षेप करके उसका अध्ययन करते हैं क्या हस्तक्षेप हो गया, तो हस्तक्षेप का अध्ययन हो पाएगा, जबकि परमाणु का अध्ययन नहीं हो पाएगा।
उत्तर : हाँ बस ऐसा ही तो हो गया।
प्रश्न : प्रथम परिवेश से प्रारम्भ करके, द्वितीय, तृतीय परिवेश में संख्याओं की कोई निश्चितता होती है या नहीं, अधिकतम संख्या कितना है?
उत्तर :इसमें हमारा कहना है, कितने भी संख्या की जो परिवेशों में जितने भी संख्या होती है, उतना ही संख्या या उतने के थोड़ा सा ज्यादा कम वाला केन्द्र में जो अंश होते हैं, उसके साथ-साथ एक आचरण निश्चित है। वो आचरण बदलता नहीं, उतना संख्या में। संख्या बढ़कर के उस संख्या में आँवें, तो भी वही आचरण करेगा। संख्या घटकर के उस संख्या में आएगा, तभी भी वही आचरण करेगा।
प्रश्न : निश्चित व्यवस्था अगर बन गई अंशों की, तो उसका एक निश्चित आचरण होगा।
उत्तर : हाँ बस इतना ही। ये तो बात हो गई। अब ये कैसा? स्वभाव गति की प्रतिष्ठा है ये। स्वभाव गति प्रतिष्ठा आचरण की स्थिरता है, ये स्वभावगति प्रतिष्ठा में ही मानव भी अपना स्वभाव गति माने आचरण को, निश्चित आचरण को देगा। नहीं तो आदमी निश्चित आचरण को देने वाला नहीं है, जब की जड़ परमाणु में निश्चित आचरण होता है। यद्यपि प्राणकोशाऐं परमाणु के रूप में काम नहीं करते हैं, अनेक परमाणुऐं उसमें होते ही हैं, प्राणकोशाओं के आचरण निश्चित हैं। उसका रचना विधि उसमें लिखा रहता है, जैसा अपने को कहते है ना कि तुम्हारा तकदीर में लिखा हुआ है, वो प्राणसूत्रों में उसका तकदीर लिखा रहता है। वो प्राण सूत्र में रचना विधि उसमें उभरा ही रहता है। वो ही रचना करेगा वो, दूसरा नहीं करेगा। कितना स्थिर आचरण है, आप सोच लो।