33. विनिमय कोष और श्रम मूल्य
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विनिमय का विधि यही है, श्रम मूल्य का मूल्यांकन, श्रम विनिमय विधि को पहचानना। एक घाट आता है, ये आदमी समझदार होने के बाद ही इसको निर्वाह कर पाता है। ये आज के जो आदमी आज जिसको महा विद्वान, महामहा उपाध्याय आप कहते हो, वो भी नहीं कर पाएगा। आदमी समझदारी के बाद ही श्रम मूल्य को मूल्यांकित कर पाता है। इसकी आवश्यकता, समझदार परिवार मूलक व्यवस्था में, ये विनिमय कोष व्यवस्था है। विनिमय कोष क्या चीज़ होता है? श्रम मूल्य का विनिमय करना है। उसका कोष क्या होगा? उपयोगिता मूल्य, कला मूल्य सम्पन्न वस्तुओं का भंड़ार। वस्तु भंडार का नाम है, विनिमय कोष। विनिमय के लिए हमारे कोष रखी हुई है, माने विनिमय योग्य वस्तुएं रखी हुई हैं। अभी कोष का मतलब क्या हो गया, वो छापाखाना में? छाप लिया फ़र्रियाँ, और उसको इकट्ठा करके ढेर लगा दिया, उसको आप कोष कहते हैं। चाटिए उसको! उसमें पेट भरेगा की इसमें पेट भरेगा? ये पेट भरने वाला कोष है।
उपयोगिता की वस्तुएं जहाँ प्रचुर मात्रा में हम संपादित कर रखे हैं, ग्राम के ज़िम्मेवारी से, ग्राम समूह के ज़िम्मेवारी से, क्षेत्र परिवार के ज़िम्मेवारी से या जिला परिवार के ज़िम्मेवारी से, ज़िला समूह के परिवार से, राज्य परिवार के समूह से प्रधान राज्य परिवार के समूह से हम जो सुरक्षित कर रखे रहते हैं हमारे उत्पादन को, ये इस प्रकार की ज़िम्मेवारी से रखी हुई वस्तुओं का नाम है भंड़ारण, उसी को हम कोष कहते हैं। विनिमय के लिए हम वस्तुओं को रखे हैं, इसी को हम कोष कहते हैं, ‘वस्तु कोष’। वस्तु कोष किसको कहा, क्योंकि विनिमय करना है, ये वस्तु को देगें हम, दूसरा वस्तु लायेंगे। मुद्रा की जरूरत कहाँ है? यदि मूल्यांकन करना बनता है श्रम मूल्य को, उसके बाद आप को मुद्रा की जरूरत नहीं हैं। ये जितने भी दग़ाबाज़ी की विधि बनाए हैं वो सब अपने आप से cyanide ले करके मर जाएगा।
मुद्रा विधि दग़ाबाज़ी का अव्वल अखाड़ा है। मुद्रा विधि ही दग़ाबाज़ी का मूल स्त्रोत है। इसको ठीक से समझने की आवश्यकता है। अन्तराष्ट्रीय कोष, दग़ाबाज़ी का बड़ा दग़ाबाज़ रहते हैं वो, दग़ाबाज़ों के गुरु रहते हैं वहाँ, अंतर्राष्ट्रीय कोष में। ये ऐसा ही बनी हुई है ये, तंत्र ही ऐसा है दग़ाबाज़ी किए बिना ये कोई चीज़ बनते ही नहीं है। इसको अच्छें ढ़ंग से समझ के इसके लिए समाधान खोजने की बात है। समाधान खोजने पर यही आकार बनता है, हमारे पास प्रचुर मात्र से गाँव की आवश्यकता से अधिक वस्तुएं सब कोष के रूप में हम रखे हैं। गाँव की दूसरे कोई आवश्यकता बनती है, उसके लिए इसको देते हैं, आवश्यकता की वस्तु लाते हैं। हमारे परिवार की आवश्यकता से जब अधिक उत्पादन कर सकते हैं, पूरा गाँव भी अपने गाँव की आवश्यकता से अधिक उत्पादन किया ही रहेगा। सीधा सीधा गणित।
प्रश्न : श्रम मूल्य का निर्धारण कैसे होगा? श्रम मूल्य के आधार पर विश्व स्तरीय व्यवस्था का व्व्यवहारिक रूप क्या होगा, जैसे कोई आदमी यात्रा करेगा?