का मुद्दा बनता है। तो ये हो गयी, जो आपके हमारे संवाद के बीच में जो कुछ भी सम्भावना प्रश्न की बनता है, वो विनय पूर्वक ये प्रस्तुति है। हमारे अनुसार हम जो परमाणुओं को देखे हैं, हर परमाणु व्यवस्था में ही रहती है।
प्रश्न : बाबाजी कल चर्चा हुई थी उसी संदर्भ में एक प्रश्न आता है, कि आपके अनुसार अस्तित्व में कितने परमाणु हो सकते है, कितने प्रकार के? जैसे आपने कहा 120 प्रकार की गठनशील परमाणु और एक गठनपूर्ण परमाणु। विज्ञान की अवधारणा के अनुसार अभी तक 108 प्रकार के तत्व पाए जाते हैं।
उत्तर : ठीक है, आगे चल करके और भी पा सकते हैं, इसको आशा रखा जाए। जैसा है अस्तित्व, उनके अनुसार तृप्त परमाणु का जो स्थिति है, 61वें नम्बर में है। उससे कम में नहीं है, उसके पहले नहीं है। तो हर तृप्त परमाणु जीवन रूप में जो प्रमाणित है, उसमें 61 क्रियाकलाप होते ही हैं। इसमें खूबी यही है, जो मध्य में एक ही अंश होता है, तृप्त परमाणु में। भौतिक परमाणुओं में क्या है विशेषता? विशेषता ये है परिवेश में जितना अंश होते हैं, उतना ही या उससे अधिक अंश बीच में होते हैं। बीच में अंश परिवेश के बराबर या उससे अधिक होना ही भार बंधन का सूत्र है। भार इसलिए बात आती है। भार के साथ ही एक परमाणु दूसरे परमाणु के साथ संयोजित होते हैं। भार को यदि व्यक्त नहीं कर पाते हैं, उस स्थिति में संयोजित होना होते ही नहीं। इस आधार पर हर एक परमाणु भार बंधन सम्पन्न है।
कल ये भी प्रश्न आई थी, बीच में एक होना या दो अंश की कोई परमाणु हो बीच में एक ही होगा। किंतु वो भार बंधन मुक्त हो गया ऐसा नहीं है, क्यों नहीं है? दो ही अंश है तो, एक अंश का भार उसमें निहित है ही। तृप्त परमाणु में क्या चीज़ है, परिवेशों में 60 अंश होते हैं, बीच में एक होते हैं, तो ये 60 अंशों का जो भार मुक्त स्थिति है, वो एक को वहन कर लेता है। एक को भार मुक्ति दिला देता है। सहअस्तित्व का ये पहला सिद्धांत यहीं वर्तमान होता है।
परिवेशों में 60 क्रियाओं को मैंने देखा है, उसको 60 अंश माना जा सकता है, कोई तकलीफ़ नहीं है। 60 क्रियाओं के चलते बीच में एक ही क्रिया होता है, जिसको आत्मा मैंने नाम दिया है। आत्मा एक ही क्रिया है, उसका परावर्तन में एक आचरण है, प्रत्यावर्तन में एक आचरण है। प्रत्यावर्तन में अनुभव आचरण है, परावर्तन में प्रमाण आचरण है। इस ढंग से आत्मा की क्रिया को देखा गया। परमाणु अंश एक ही होते हुए, परावर्तन विधि से, प्रत्यावर्तन विधि से, दो प्रकार के आचरणों को देखा गया। उसको यथावत हम एक documentation करने की भी काम किया है। उसको मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान में काफ़ी अच्छे ढंग से बताने की कोशिश की। परमाणु का विकास का अध्याय जो समाधानात्मक भौतिकवाद में जो उल्लेख है, उसमें भी परमाणुओं के बारे में अपने ढंग से बताने की मैं कोशिश की है। उसमें कितना विज्ञानी संतुष्ट हो पाते हैं, नहीं हो पाते हैं, वो आगे की बात है। किंतु मैंने जैसे देखा है, समझा है, उसको वैसे ही मेंने लिखा है। एक बात ये हो गयी।
इस विधि में जो प्रजाति के बारे में जो बात हुई, एक परमाणु का ज़्यादा से ज़्यादा 120 प्रजाति हो सकते हैं। 120 प्रजाति में से जितना हम पहचानने में आई है, वो पहचानने में आई है। ये भी हम सुनते हैं कि क्रम से कुछ संख्या तक पहचान हुई, उसके बाद और कुछ संख्या तक पहचान हुई, उसके बाद और कुछ संख्या तक पहचान हुई, ऐसा ही हम सुनते हैं। यदि यही कथा है, आगे चल करके और भी पहचान में आएंगे, ऐसा तो आशा रखा ही जा सकता है। इस ढंग से 120 एक प्रकार से तर्क संगत विधि से ये आता है, क्योंकि भूखे परमाणुऐं तृप्त परमाणु के पहले कहलाता है, वो 60 निश्चित है। उसमें कोई भी hotchpotch नहीं है। कम ज्यादा नहीं है। उसके बाद कितना हो सकता है