2. मानव केंद्रित चिंतन
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प्रश्न्न- बाबाजी आपने इस चिंतन को - अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन - ऐसा क्यों कहा? मानव को केन्द्र में रख कर सोचने की क्या जरूरत थी? और अस्तित्व मूलक होने से आपका क्या आशय है? और पुरानी विचार धाराएँ जो हमको मानव जाति की मिलती हैं, उसमें क्या कमी रह गई थी जिसकी वजह से आपको इस नाम से एक चिंतन को मनुष्य जाति के सामने रखना पड़ा?
उत्तर : अभी इस बात पर आपने प्रकाश डालने के लिये कहा है कि मध्यस्थ दर्शन अपने आप में ये प्रतिपादन किया है कि अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन है। या दूसरा विधि से यह भी बता कहा है अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन से ये मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद निष्पन्न हुई - ये बात को प्रकट किया है। आपने इस बात का प्रश्न्न किया है - अभी विगत में जो दो बात आ गई थी, उसके बाद भी आप तीसरे प्रकार से अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन बताने की क्या आवश्यकता आ गई थी। ये आपने पूछा। ये आवश्यकता ही नहीं है, नितांत हमारा तकाज़ा हो गई, दूसरा कोई रास्ता ही नहीं रह गया। दूसरा कोई विधि से इसको कोई बताया भी नहीं जा सका। ऐसा हम परिस्थिति में आ गये। क्योंकि अस्तित्व विगत दोनों प्रकार की विचार से ,आपसे विनय किया है, अस्तित्व पूरा अध्ययन गम्य नहीं हुई थी, ये एक बात बताया। दूसरा मनुष्य तो पहले से भी था, मनुष्य ही सब कुछ करता रहा, विचारता रहा, मनुष्य अपने जीवन को ही पहचानने में कोई रास्ता नहीं निकला था। ये बात आपको बताए थे। तीसरा बात ये भी बताया है कि जीवन ही दृष्टा कर्ता भोगता है। वो दृष्टा पद को, कर्ता पद को, भोगता पद को मानव परंपरा में ही जीवन प्रमाणित करता है। मूल मुद्दा यही है। दू
सरा कोई परिस्थिति में, जैसा कि जीव संसार में भी जीवन होता है, होते हुए दृष्टा, कर्ता, भोगता पद को वो प्रमाणित नहीं करता है। इस आधार पर मनुष्य ही दृष्टा, कर्ता भोगता पद को प्रमाणित करता है, इस विधि से अस्तित्व तो नित्य वर्तमान है ही है, आप माने चाहे न मानें, जानें चाहे न जानें, वो दोनों फर्क नहीं पड़ने वाला है। अस्तित्व तो रहता ही है, जो थी नहीं वो होते ही नहीं। वर्तमान में जो कुछ भी प्रमाणित होता है, वो था ही पहले, वोही प्रमाणित होने में आता है। अब रह गया कि मनुष्य उसको जो था, उसको क्या मनुष्य ने पहचाना था? यह प्रश्न बनता है। इस प्रश्न के अर्थ में तो पहले कुछ पहचाना गया - ईश्वर, परमात्मा, देवता - इस प्रकार की परिकल्पनाएँ हुई और उसके बाद, जो है ना वस्तु, रसायन, भौतिकता, ठोस, तरल, विरल ये सभी बातें शुरू हुई। इसके आधार पर कुछ बातें ये प्रस्तुत किये। प्रस्तुत करने पर इसका गम्य स्थली संग्रह सुविधा की जगह में पहुँचाया, भौतिकवादी विधि से, वो पूरा होने वाला नहीं है। इसीलिए ये कहीं भी परिवार या समाज व्यवस्था होने का तरीके की आधार नहीं बना। इतनी ही बात है।
दूसरे विधि से आदर्शवादी विधि से हम चले गये - ईश्वर सब कुछ करता है, हमारा कोई ज़िम्मेदारी ही नहीं रहा। हर क्षण में, हर पल में ईश्वर से डरते रहो और डर करके प्रार्थना करते रहो जो - जो कुछ भी घटित होता है, उन्हीं की कृपा से हो रहा है मानो। मर गये तो उन्हीं से रूठ गए और जी गये तो भगवान की कृपा रही, इस ढंग से हम व्याख्या