26. उत्पादन कार्य योजना
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उत्पादन कार्य योजना की बात आती है, परिवार मूलक स्वराज्य योजना के तहत में। आपने क्या कर दिया? अधर में ले जा कर के उत्पादन कार्य लिख दिया। आप को लिखना है, परिवार मूलक स्वराज योजना के तहत में उत्पादन कार्य योजना। दूसरे विधि से उत्पादन कार्य योजना आता ही नहीं। योजना का मतलब है, प्रमाणित होने की तरीका। वो तरीका मानव जागृत होने के बाद परिवार मूलक स्वराज व्यवस्था में जीने के क्रम में उत्पादन कार्य योजना प्रमाणित होता है। जैसा मैं अपने में, समझदारी को उपार्जन करने के उपरांत, उसको प्रमाणित करने के क्रम में, उत्पादन कार्य योजना को मैंने प्रमाणित किया है। उत्पादन कार्य योजना को प्रमाणित करने का क्या मतलब है? हमारा आवश्यकता से अधिक उत्पादन कर देना, समृद्धि का अनुभव करना, ये इसका मतलब है। ठीक हो गई।
उत्पादन का क्या मतलब बताया? प्राकृतिक ऐश्वर्य पर अपने श्रम नियोजन पूर्वक, उपयोगिता मूल्य, सुदंरता मूल्य को प्रमाणित कर देना, स्थापित कर देना। हम करते ही हैं रोज मर्रा में। तो इस विधि से हम श्रम नियोजन पूर्वक उपयोगिता मूल्य, कला मूल्य को वस्तुओं में स्थापित करते हैं। ये मानव का श्रम नियोजन का फलन है, ये मानव कुल में ही होता है, सर्वाधिक। यदि छोटे-छोटे बात को हम यदि निरीक्षण करें, कुछ ऐसे पक्षियाँ घोंसला बनाते हैं, अपने आवास योग्य बना लेते हैं और कुछ पक्षियाँ झाड़ में कोड़र बनाते हैं, कोड़-कोड़ कर के कोड़र बना कर के आवास योग्य बना लेते हैं। कुछ पक्षियाँ घास से अपना घर को बना लेते हैं, उसके अंदर आवास योग्य व्यवस्था बना लेते हैं। ये भी हुआ है, कुछ पक्षियाँ। किन्तु जीव जानवर सभी, तो जो प्राकृतिक विधि से जहाँ सोने की योग्य है, उसको खोज-खाज करके सो लेते हैं, थोड़ा देर, और जहाँ आहार मिलता है, वहाँ खोज-खाज करके खा लेते हैं।
इस ढंग से भी बात है। इस विधि में पेट भरने का काम जितने भी पक्षी संसार है, चींटी है, हाथी है, सभी अपना पेट भरता ही है। सबसे जो अभी राम कथा ये ही है, आदमी को पेट भरने योग्य नहीं है, ऐसा हम बिल्कुल करार देते जा रहे हैं। जबकि चींटी पेट भरता ही है, हाथी पेट भरता ही है, आदमी चींटी से बदतर है क्या? पूछा जाए तो क्या कहेगें आप, नहीं हैं, ऐसा कहेंगे। चींटी से बदतर है कह सकेंगे? नहीं कह सेकेंगे। इसके बावजूद हमारा आवाज सभी माध्यमों से हर परिस्थितियों से आदमी को अपने आजीविका को उपार्जन करने योग्य नहीं है। उसमें भी कौन नहीं है? पढ़ा-लिखा तो बिल्कुल नहीं है। क्या बात हुआ ये शिक्षा का क्या मतलब हुआ भाई? ये एक हंसी की बात हुआ, भद्दगी की बात हुआ कि नहीं हुआ? आप ही सोच के देखिए, यदि पढ़-लिख कर के आदमी अपने पेट भरने से असमर्थ हो जाए, इससे भद्दगी की बात क्या हो सकता है। ऐसा मेरा सोचना है।
मनुष्य तो इन सबसे ज्यादा विकसित पद में है, ये भी एक तरफ से अपन आंकलित करते ही हैं, स्वीकारते भी हैं, हाँ भाई जानवर से हम अच्छे हैं, इस बात को हर व्यक्ति स्वीकारता ही है। ठीक है। चींटी, हाथी से भी अच्छे हैं ये भी स्वीकारता है। उतना ही नहीं है, चींटी को, हाथी को सब हाँकता भी है और बाघ जैसे हिंसक पशुओं को भी मार गिराता है, ये भी देखा गया है। ठीक है। ये सब बातें होते हुए मनुष्य जो है ना अपने पेट भरने में योग्य नहीं है, इस बात को हम बारंबार घोषणा करते हैं, इसका क्या मतलब होगा? ये हंसी की बात है। इसका मतलब ये हुआ हमारा शिक्षा