31. कला और तकनीकी
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कला का हम ये कहते हैं, एक वस्तु को अलंकृत करने के लिए। जैसा ये कपड़ा है, इसमें जो रंग रोगन लगी है, इसका नाम है कला। ये घर को शोभायमान बनाने के लिए हम सफेद पोतते हैं, लाल पोतते हैं, हरा पोतते हैं, कुछ भी करते हैं, ये सब अलंकार को कला मानी जाती है। वो अलंकृत करना, उपयोगिता के साथ अलंकार होना आवश्यक है, अलंकृत होना आवश्यक है। इसको हम कला कहते हैं। जैसा कुर्सी बनाया, वो चिकना हो ये कला है, और बैठने पर सुविधाजनक हो ये कला है, ये जो सिरहाना बनाके रखना एक कला है। कपड़ा बनाना एक कला है, मटका बनाना एक कला है, धातु की बर्तनों को बनाना एक कला है, वस्त्र को सीना एक कला है। इस प्रकार के कलाओं में हम समझता हूँ मानव परंपरा अपने आप को काफी समृद्ध बना लिया है।
प्रश्न : कला और तकनीकी में अंतर कैसे करेंगे?
उत्तर : देखिए तकनीकी के बारे मे ये आता है, जैसा हस्तकला। हस्तकला में जितने भी तकनीकी लगती है, वो व्यक्ति के अधीनस्थ हो जाता है। व्यक्ति के मन में ही वो स्थापित होता है, हाथों से प्रयोजित हो जाता है, इसका नाम है हस्तकला। ग्राम शिल्प, गाँव के लिये आवश्यकीय वस्तुऐं गाँव में पैदा हो जाए, इसका नाम है ग्राम शिल्प। उसमे चर्मकला, मिट्टी की कला, धातु कला, सुहनारी, चमारी, लोहारी सब इकट्ठा हो जाए, ये ग्राम शिल्प कहलाता है। ये ना परिभाषा मे आता है। उसके बाद आता है वस्त्र बनना, मकान बनना, येन बनना, तीन बनना - ये भी ग्राम शिल्प के अंदर आता है या कुटीर उद्योग के अंदर आता है। तो कुटीर उद्योग में यही है, जो कपड़ा बनाते है, बुनते है उसको कुटीर उद्योग कह लेते हैं।ईंटा को जोड़ना भी एक कला है, शिल्प कला और पत्थर को गढ़ना, मिट्टी की मूर्ति बना देना, ये भी शिल्प कला कहलाता है। चित्रकला में वोही होता है, किसी भित्ति पर किसी पृष्ठभूमि पर जो अपने इच्छित आकार को स्थापित कर देना ये चित्रकला कहलाता है। इस प्रकार की कलाओं को कहते हैं ये सब पूरा गाँव में ज्यादा से ज्यादा प्रचलित रहे, ऐसा हम चाहते हैं। जो उस गाँव में देख करके आया अच्छा काम, वो हमने यहाँ कर लिया। यहाँ देख लिया, अपने गाँव में कर लिया। इस प्रकार से कला समृद्धि की बात बनती है। इसको बनाए रखने की आवश्यकता है।
उसके बाद आता है यंत्र कला। ये भी मनुष्य के काबू के चीज़ हो गई। यंत्र कला में cycle बनाना है, उसके लिए एक machine चाहिए। और motor engine बनाना है, उसके लिए एक यंत्र चाहिए, rail engine बनाने के लिए यंत्र चाहिए। इस प्रकार की यंत्रों की सहायता से दूसरे यंत्रों को बनाने की स्थिति आती है। और मूलतः जो यंत्र है, जिससे यंत्रों को बनाते हैं, वो भी बनाना एक कला है, वो भी तकनीकी है। यंत्रों से पुनः दूसरा यंत्रों को बनाना भी एक तकनीकी है। ये कुछ सीमित लोगों के साथ-साथ ये चल पड़ता है। हर व्यक्ति के साथ ये कला चलेगा नहीं, अभी के अनुसार। और आगे भी ऐसा ही रहेगा। किंतु ये कला, ये तकनीकी जो सब को आया रहता है, और handle करेगें कुछ लोग। जो जितने भी तकनीकी है, लोक व्यापीकरण करने की कथा है। तकनीकी लोकव्यापीकरण करने में किसी को तकलीफ नहीं है। उसी में उत्पादन की अरमान, उत्पादन की निश्चयन, उत्पादन में विश्वास, ये तीनों