45. अंतर्मुखी एवं बहिर्मुखी – 2
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प्रश्न : साधु वेशधारी को साधुवाद क्यों बोलते हैं ?
उत्तर : कहते हैं, साधु वेश वाले को, उसको ऐसा सोच लेते हैं ठीक है, साधु वेश वालों को हम ऐसा देखते हैं। कोई साधु वेश नहीं लगाया भाई? हम वहाँ काशी में जो बैठे रहते हैं, विश्वनाथ जी के पास बहुत सारे। उसको पूछे, कैसे हो भाई? बोलते हैं भगवान का कृपा हैं, विश्वनाथ जी का कृपा है, ऐसा कुछ कहते हैं। दो पैसे देने से उससे तृप्त रहते हैं, वो अपने ढ़ंग से काम करते हैं, ये सब चीज़ें हम देखा हुआ बात है। तो भाषा और आनंद। आनंद यदि जीवन में होता है, वो परंपरा में प्रमाणित होता है। क्या प्रमाणित होता है भाई? समाधान के रूप में पहले प्रमाणित होता है। हमारा कार्य व्यवहार में समाधान आता है। वो आपको भी मूल्यांकित करने में आता है, मुझको भी मूल्यांकित करने में आता है, दोनों में तृप्ति होती है। यदि समाधान आता है उसका आगे की मुद्दा ये है, हम समृद्धि पूर्वक जीने योग्य हो जाते हैं, ये दूसरा प्रमाण है, दूसरा milestone है ये। इस channel को छोड़कर अपन भागना चाहेंगे, वो बनेगा नहीं। तो पहले हम समझदार होने का पहला प्रमाण समाधान है, उसके बाद दूसरा मुद्दा समृद्धि, तीसरा मुद्दा में वर्तमान में विश्वास। वर्तमान में विश्वास करना ही हम अभयशील होने का प्रमाण है। वर्तमान में विश्वास हो जाए तो हम भयभीत काहे को? जैसे हम आप बैठे हैं, हमको इस क्षण के प्रति खूब विश्वास है, तो कौन कट्टा बंदुक लेकर बैठे हो? इस क्षण में आपको, हम सबको विश्वास है कि हमारे ऊपर कोई ख़तरा नहीं, कोई भी जोखिम नहीं, कोई परेशानी नहीं है, कोई आपदा नहीं है, ये इसी बात का द्योतक है। ये वर्तमान में विश्वास को रखे रहना, ये अपने आप में समझदारी का एक वैभव है, सिद्धि है, चमत्कार है, कुछ भी आप कह सकते हैं। चौथा वैभव यही है, हम सहअस्तित्व में सदा-सदा प्रमाणित होते हैं। साथ-साथ में जी कर हम खुशहाली मनाते हैं। यही प्रमाण है।
प्रश्न : एक बार प्रमाण शब्द को भी स्पष्ट कर दीजिए?
उत्तर : ये चारों चीज़ गवाहित हो जाएं, यही प्रमाण है।जीने का प्रमाण यही है । ये हो गया पूरा का पूरा मसाला। ये किसका आवश्यकता है? ये पूरे के पूरा मानव का अपेक्षा है ये। ये हुआ समझदारी का एक प्रमाण। दूसरे ओर, जीवन से जुड़ी हुई समाधान। अभय भी, माने वर्तमान में विश्वास भी, जीवन से जुड़ी हुई है। सहअस्तित्व में जो है ना खुशहाली मनाना, ये भी जीवन से जुड़ी हुई है। शरीर से जुड़ी हुई क्या चीज़ हो गई? केवल समृद्धि हुई। शरीर के लिए समृद्धि चाहिए, जीवन के लिए ये तीनों चीज़ चाहिए। इस प्रकार से क्या हुआ, जो जीवन की तीन पैर, शरीर का एक पैर मिल कर के मानव का 4 पैर। क्या हो गए, जुगाड़ क्या हुआ? जीवन का तीनों वैभव सीधा-सीधा और शरीर के लिए एक वैभव मिल करके चारों वैभव के साथ मानव परंपरा सुखी रहता है। क्या प्रमाणित होने का फल है ये? समझदारी प्रमाणित होने का फल है। इसमें आप हम सहमत हो सकते हैं कि नहीं हो सकते हैं, ये सोचने की मुद्दा है। यदि इससे हम सहमत होते हैं तब अपन एक निष्कर्ष निकाल सकते हैं। अंतर्मुखी बहिर्मुखी का प्रमाण व्यवहार में ही है और कहीं प्रमाण नहीं है। यदि मान लें अंतर्मुखी जितने भी प्रयास है वो समाजीकरण हो गया, या मानवीयकरण हो गया। यदि हम इसको ऐसा सोच लें, कि नहीं भई, अंतर्मुखी, अंतर्मुखी ही रहेगा, बहिर्मुखी, बहिर्मुखी ही रहेगा।