स्पष्ट रहे। अभी क्या है, हमको ये स्पष्ट नहीं है कि व्यवस्था के अर्थ में है। हमको ऐसा लगता है कि उससे हम कुछ भी कर सकते है। कुछ भी कर सकते है, ये सोचना गलत है लेकिन वो व्यवस्था में है, और उसका एक निश्चित व्यवस्था है, उसका जो विभाजन है, केन्द्र में और विभिन्न परिवेशों में, ये बात हमको अगर स्पष्ट हो तो उनका हम सदुपयोग कर सकते हैं, मानव उपयोगी बनाने में।
उत्तर : ये स्वागतीय बिंदु है।मैं समझता हूँ, आपको भी संतुष्टि मिलता होगा, और औरों को भी संतुष्टि मिलेगा। व्यवस्था के अर्थ में विज्ञान जितना काम किया वो स्वागतीय है बताया, और पहले भी इस बात को हमने स्वीकार है, दूरदर्शन, दूरगमन, दूरदर्शन संबंधी उपलब्धियाँ विज्ञान विधि से हमको प्राप्त हुआ है, ये उपकार है, और नाश के लिए जितने भी किया वो प्रकृति विरोधी है, इस बात को हम स्पष्ट किया। आपने अंशों को समझने के आधार पर जो कुछ भी उपकार कार्य किया है, वो तो संसार सदा-सदा के लिए स्वागत करेगा ही। वो उपकार को कोई भूलेगा नहीं। भूला हुई बात को जोड़ने की आवश्यकता मेरे पास थी, वो आवश्यकता को हम पूरा किया है। उसका उत्तरदायी मैं ही हूँ। उसमें हम प्रमाणित हूँ। मनुष्य व्यवस्था के रूप में जीने की आवश्यकता है, मनुष्य व्यवस्था के रूप में जीने के लिए जितना ज्ञान चाहिए, किसका? परमाणु का, अजीर्ण और भूखे, तृप्त, उसको हम प्रस्तुत किया है। तृप्त परमाणु ही जीवन रूप में हर मनुष्य में काम कर रहा है।
इसको हम बोध कराना चाहते हैं, उसमें हम प्रयत्नशील हैं, आंशिक रूप में हम सफल भी हैं। ये दूसरे भाग है। ये इस अर्थ में है, मनुष्य जीवन को समझने के बाद, जीवन एक व्यवस्था के रूप में बोध होने के बाद जीवन से ही जीवन का जीवन में बोध होना है, ये प्रक्रिया यदि मानव के गले से उतर जाता है, मानव व्यवस्था में जीयेगा। ये मेरा विश्वास है, जब मैं समझा, उसके बाद मेरा व्यवस्था में जीना सुगम हो गया। उसके पहले हमारे पास व्यवस्था में जीना सुगम नहीं था। यदि सुगम होता वेद को पड़ायन करके, शास्त्रों को पढ़ करके और उपनिषदों को याद करके, हम ब्रह्म सूत्रों को रट करके, व्याकरण सूत्रों को रट करके यदि हमको ये ज्ञान होता, व्यवस्था में जीना होता, तो अमरकंटक आने की हमारा कोई आवश्यकता नहीं होती। हम इस सब में से गुजरा हुआ व्यक्ति हूँ।
ये सब में गुजरने के बाद भी हम को व्यवस्था में जीना बना नहीं, और व्यवस्था के प्रति हम विश्वास करना भी बना नहीं। वो कहाँ से ये फूट पड़ा? जब संविधान बना, भारतीय संविधान, उसके लिए जो वैदिक चिंतन के विधि से क्या सूत्र होगा संविधान में आचरण का, वो दीजिये बोलने से कुछ भी नहीं निकला। कुछ भी नहीं निकाला तो हम ये अपने को अनुभव किया ये सब लाद करके मरने की क्या जरूरत है, ऐसा स्थिति बनी। और उस अभिशाप से छूटने के लिए हमको अभ्यास करना पड़ा, उसका उत्तर पाना पड़ा। मुख्य मुद्दे पर इसी विधि से हम अभ्यास में रत हुए। उसमें हमको समझ में आ गई, व्यवस्था में जीना संभव है, व्यवस्था में मैं जिया हूँ और और भी जीने की सम्भावना रखी हुई है। इस बात पर हम कायम हुए, कायम होने के पश्चात हम अपने प्रमाणिकता को अभी तक व्यक्त करते जा रहा हूँ, जब तक स्वस्थ शरीर रहेगा, जीवन जब तक अपने जागृति को प्रमाणित करने योग्य रहेगा शरीर, तब तक हम ऐसे ही प्रमाणित रहेगें।
प्रश्न : हम लोगों को इसकी आवश्यकता तो बनी हुई है की परमाणु के अंश के संख्या, उसकी संरचना, परिवेश में संख्या कैसे बढ़ रहे हैं, इसको देखना आवश्यक है क्योंकि उससे उस परमाणु के संरचना और उसके आधार पर उसका