17. परमाणु - 4 (अंश और जीवन परमाणु)
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जय हो, मंगल हो, कल्याण हो!
कल के दिन परमाणुओं के सम्बंध में आप हमारे संवाद कुछ हुआ। उसमें एक संकेत आप लोगों ने हमें बताया है - परमाणु में मूलतः रचना के रूप में आपका सोच हमारा सोच भौतिक रासायनिक परमाणुओं के बारे एक जगह में एक ही सा लगा। वो है परिवेशों में जितना अंश होते हैं, उतने ही या उससे ज़्यादा ये मध्य में होते हैं। इस बात पर अभी तक विज्ञानियों का दृष्टिकोण हमारा दोनों एक जगह में मिली। उससे हमको बहुत अच्छा लगा, ऐसा लगा सिलसिले से सिलसिलेवार यदि कोई चीज़ समझने की कोशिश किया है कोई आदमी, उनको सहअस्तित्व में जैसा एक व्यवस्था है, वैसे ही बोध हुआ है, ऐसा मैं समझा हूँ।
दूसरे बात ये आई, तो वो भी काफ़ी हमको अच्छी लगी, कि जीवन एक परमाणु है, परमाणु गठन में मैंने ये देखा है कि मध्य में एक ही क्रिया होता है, जिसको आत्मा नाम दिया है। परिवेशों में जो क्रियाएँ होते हैं, उनका नाम क्रम से बुद्वि, चित्, वृत्ति और मन नाम दिया है। इन परिवेशों में क्रम से ऐसे ही संख्यात्मक क्रिया देखी गई है - बुद्वि में 2 क्रिया, चित् में 8 क्रिया, वृत्ति में 18 क्रिया और मन में 32 क्रियाओं को मैंने देखा।
उसका परावर्तन, प्रत्यावर्तन प्रक्रियाओं को मैं मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान में प्रस्तुत करने की कोशिश किया है, और ग्रंथों में भी समय-समय पर जितना आवश्यकता पड़ती रही वैसा प्रस्तुत किया है। आप लोगों ने ये भी बताया कि परमाणुओं का मूल रचना भौतिक रासायनिक परमाणुओं में यही विधि है - 2, 8, 18 के रूप में रहता है। मध्य में इन सबके बराबर अंश या उससे अधिक अंश समाहित रहती हैं, ऐसा आप लोगों ने बताया। आप लोगों से ऐसा उद्गार सुन करके हमको बहुत अच्छा लगा। यदि विधिवत ये बात देखें हैं, इसमें आप लोगों को, अर्थात विज्ञान संसार को, व्यवस्था में भरोसा ना होने का क्या कारण? अव्यवस्था पैदा करने का क्या कारण? दो प्रश्न होते हैं। उसका उत्तर आप लोगों से पाना है, कोई इसका उत्तर देगा कोई माई-बाप होगा तो उनसे उत्तर समझता रहूँगा। एक तो बात ये हुई। ये भी मुद्दा हमको बहुत अच्छी लगी।
उसके बाद आता है कि ये जो अजीर्ण परमाणु और भूखे परमाणु का बात तृप्त परमाणु के अर्थ में ही हम समझा। नाम देना होगा यदि भूखे परमाणु और अजीर्ण परमाणु, एक तृप्त परमाणु के आधार पर ही हम भूखे को बता सकते हैं और अजीर्ण को बता सकते हैं। उस आधार पर हम शुरू किया दो परमाणुओं के स्वरूप में, जो आधारों पर ये किया, अंशों का परिवर्तन होने की बात को हम स्वीकारा है। अंशों का परिवर्तन जब तक होता है, यही भूखे और अजीर्ण परमाणुओं के रूप में रहते हैं। ये शुद्ध भौतिक रूप में भी सहवासीय विधि से या तात्विक विधि से प्रदर्शित होते रहते हैं, और वोही परमाणुएँ जब कभी यौगिक हो जाते हैं, वो दूसरा प्रकार से आचरण को प्रस्तुत करते हैं, वो भी निश्चित है, जो रसायन संसार कहलाता है। इसमें हमको कोई तकलीफ़ दिखाई नहीं पड़ती है।